मज़ा Poetry (page 8)

उन्हें तो सितम का मज़ा पड़ गया है

बेख़ुद देहलवी

कोई इस तरह से मिलने का मज़ा मिलता है

बेख़ुद देहलवी

वो और तसल्ली मुझे दें उन की बला दे

बेख़ुद देहलवी

क्या मिले आप की महफ़िल में भला एक से एक

बेख़ुद देहलवी

दोनों ही की जानिब से हो गर अहद-ए-वफ़ा हो

बेख़ुद देहलवी

बख़्त क्या जाने भला या कि बुरा होता है

बेबाक भोजपुरी

ख़त में क्या क्या लिखूँ याद आती है हर बात पे बात

बासिर सुल्तान काज़मी

दर्द-ए-दिल आज भी है जोश-ए-वफ़ा आज भी है

बाक़र मेहदी

अजीब दिल में मिरे आज इज़्तिराब सा है!

बाक़र मेहदी

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में

ज़फ़र

मुझ को नहीं मालूम कि वो कौन है क्या है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

इस ज़िंदगी के बदले

अज़रा अब्बास

एक ज़िंदगी और मिल जाए

अज़रा अब्बास

शीशा लब से जुदा नहीं होता

अज़ीज़ वारसी

रूठ जाएगा तो मुझ से और क्या ले जाएगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

जब भी हँसी की गर्द में चेहरा छुपा लिया

असलम कोलसरी

आग सी लग रही है सीने में

असलम फ़र्रुख़ी

आग सी लग रही है सीने में

असलम फ़र्रुख़ी

बात वो जो कभी हुई ही नहीं

अशरफ़ नक़वी

दर्द लेंगे न हम दवा लेंगे

अशरफ़ नक़वी

कहने आए थे कुछ कहा ही नहीं

असग़र वेलोरी

हुस्न को वुसअतें जो दीं इश्क़ को हौसला दिया

असग़र गोंडवी

आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं

आरज़ू लखनवी

सुपुर्द-ए-आब यूँ ही तो नहीं करता हूँ ख़ाक अपनी

अरशद जमाल 'सारिम'

ये ख़ाकी पैरहन इक इस्म की बंदिश में रहता है

अरशद जमाल 'सारिम'

ये बोले जो उन को कहा बे-मुरव्वत

अरशद अली ख़ान क़लक़

शरफ़ इंसान को कब ज़िल्ल-ए-हुमा देता है

अरशद अली ख़ान क़लक़

परतव पड़ा जो आरिज़-ए-गुलगून-ए-यार का

अरशद अली ख़ान क़लक़

बोलेगा कौन आशिक़-ए-नादार की तरफ़

अरशद अली ख़ान क़लक़

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