मिल Poetry (page 8)

जिन से मिल कर ज़िंदगी से इश्क़ हो जाए वो लोग

सुरूर बाराबंकवी

पतझड़ की हवा

सुलतान सुबहानी

मेरे ख़ुश-आइंद-मुस्तक़बिल का पैग़म्बर भी तू

सुलतान रशक

ख़ुशियाँ न छोड़ अपने लिए ग़म तलब न कर

सुलतान रशक

जो नज़र आता नहीं दीवार में दर और है

सुलतान रशक

बड़ी दानाई से अंदाज़-ए-अय्यारी बदलते हैं

सुलतान रशक

जिस को क़रीब पाया उसी से लिपट गए

सुल्तान अख़्तर

दर-ब-दर की ख़ाक पेशानी पे मल कर आएगा

सुल्तान अख़्तर

वो सर से पाँव तलक चाहतों में डूबा था

सुलेमान ख़ुमार

तुझ से बिछड़ूँ तो ये ख़दशा है अकेला हो जाऊँ

सुलेमान ख़ुमार

तुम किस से मिलने आए हो

सुलैमान अरीब

प्यार का दर्द का मज़हब नहीं होता कोई

सुलैमान अरीब

हमारे जैसे ही लोगों से शहर भर गए हैं

सुहैल अख़्तर

वो एक लड़की जो ख़ंदा-लब थी न जाने क्यूँ चश्म-तर गई वो

सूफ़िया अनजुम ताज

वफ़ा की आख़िरी मंज़िल भी आ रही है क़रीब

सूफ़ी तबस्सुम

किसी में ताब-ए-अलम नहीं है किसी में सोज़-ए-वफ़ा नहीं है

सूफ़ी तबस्सुम

ग़म-नसीबों को किसी ने तो पुकारा होगा

सूफ़ी तबस्सुम

कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया

सुदर्शन फ़ाकिर

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया

सुदर्शन फ़ाकिर

हवस

सुबोध लाल साक़ी

चुनाव

सुबोध लाल साक़ी

ख़ुशनुमा पल की गिरफ़्तारी करें

सोनरूपा विशाल

सुलगते दश्त का मंज़र हुई हैं

सिया सचदेव

लिखा जो अश्क से तहरीर में नहीं आया

सिया सचदेव

यारब सराब-ए-अहल-ए-हवस से नजात दे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

ख़बर रिहाई की मिल चुकी है चराग़ फूलों के जल रहे हैं

सिराज लखनवी

मुझे अब हवा-ए-चमन नहीं कि क़फ़स में गूना क़रार है

सिराज लखनवी

अच्छा क़िसास लेना फिर आह-ए-आतिशीं से

सिराज लखनवी

मस्जिद अबरू में तेरी मर्दुमुक है जिऊँ इमाम

सिराज औरंगाबादी

माइल हूँ गुल-बदन का मुझे गुल सीं क्या ग़रज़

सिराज औरंगाबादी

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