नज़र Poetry (page 16)
ऐ दिल-ए-ख़ुद-ना-शनास ऐसा भी क्या
उम्मीद फ़ाज़ली
जब भी पेड़ों पे समर जागता है
उमर फ़रहत
मुझे मेहमाँ ही जानो रात भर का
उमर अंसारी
जिस आईने में भी झाँका नज़र उसी से मिली
उमर अंसारी
हर इक का दर्द उसी आशुफ़्ता-सर में तन्हा था
उमर अंसारी
खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े
उमैर नजमी
दाएँ बाज़ू में गड़ा तीर नहीं खींच सका
उमैर नजमी
जब इंसान को अपना कुछ इदराक हुआ
उमैर मंज़र
साक़ी कुछ आज तुझ को ख़बर है बसंत की
उफ़ुक़ लखनवी
बसंत और होली की बहार
उफ़ुक़ लखनवी
इश्क़ में हर तमन्ना-ए-क़ल्ब-ए-हज़ीं सुर्ख़ आँसू बहाए तो मैं क्या करूँ
तुर्फ़ा क़ुरैशी
देखा है कहीं रंग-ए-सहर वक़्त से पहले
तुर्फ़ा क़ुरैशी
ज़ुल्म को तेरे ये ताक़त नहीं मिलने वाली
तुफ़ैल चतुर्वेदी
कोई वादा न देंगे दान में क्या
तुफ़ैल चतुर्वेदी
इक बहाना है तुझे याद किए जाने का
तुफ़ैल बिस्मिल
तजरबा जो भी है मेरा मैं वही लिखता हूँ
त्रिपुरारि
साफ़ आता है नज़र अंजाम हर आग़ाज़ का
तिलोकचंद महरूम
दिल के तालिब नज़र आते हैं हसीं हर जानिब
तिलोकचंद महरूम
वो दिल कहाँ है अहल-ए-नज़र दिल कहें जिसे
तिलोकचंद महरूम
ताइर-ए-दिल के लिए ज़ुल्फ़ का जाल अच्छा है
तिलोकचंद महरूम
शहर से एक तरफ़ दूर बहुत
तिलोकचंद महरूम
नज़र उठा दिल-ए-नादाँ ये जुस्तुजू क्या है
तिलोकचंद महरूम
इस का गिला नहीं कि दुआ बे-असर गई
तिलोकचंद महरूम
हिज्राँ की शब जो दर्द के मारे उदास हैं
तिलोकचंद महरूम
फ़ित्ना-आरा शोरिश-ए-उम्मीद है मेरे लिए
तिलोकचंद महरूम
बदनाम हूँ पर आशिक़-ए-बदनाम तुम्हारा
तिलोकचंद महरूम
दिल है बेताब नज़र खोई हुई लगती है
तिलक राज पारस
हर इक के दुख पे जो अहल-ए-क़लम तड़पता था
तिफ़्ल दारा
मेरी सूरत साया-ए-दीवार-ओ-दर में कौन है
तौसीफ़ तबस्सुम
मेरी सूरत साया-ए-दीवार-ओ-दर में कौन है
तौसीफ़ तबस्सुम
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