नज़र Poetry (page 15)

शाफ़्फ़ाफ़ियाँ(2)

वहीद अहमद

शफ़्फ़ाफियाँ

वहीद अहमद

पचासी साल नीचे गिर गए

वहीद अहमद

कोई बस्ती कि मुझ में बस्ती है

वहीद अहमद

हैं किस लिए उदास कोई पूछता नहीं

विश्वनाथ दर्द

दीवार-ओ-दर सा चाहिए दीवार-ओ-दर मुझे

विशाल खुल्लर

इश्क़ बीनाई बढ़ा देता है

विकास शर्मा राज़

रोज़ ये ख़्वाब डराता हैं मुझे

विकास शर्मा राज़

शहर बेज़ार रहगुज़र तन्हा

विजय शर्मा अर्श

किसी सूखे हुए शजर सा हूँ

विजय शर्मा अर्श

अंदरूँ नींद का इक ख़ाली मकाँ होता था

वसाफ़ बासित

जी में है इक दिन झूम कर उस शोख़ को सज्दा करूँ

वारिस किरमानी

बहुत दिनों में हम उन से जो हम-कलाम हुए

वारिस किरमानी

आख़िर वो इज़्तिराब के दिन भी गुज़र गए

वारिस किरमानी

तमाम रात वो जागा किसी के वा'दे पर

वफ़ा मलिकपुरी

आसमाँ से सहीफ़े उतरते रहे

उषा भदोरिया

काश उस बुत को भी हम वक़्फ़-ए-तमन्ना देखें

उरूज ज़ैदी बदायूनी

मेरा साक़ी

उरूज क़ादरी

वो ध्यान की राहों में जहाँ हम को मिलेगा

उर्फ़ी आफ़ाक़ी

मिरी समझ में आ गया हर एक राज़-ए-ज़िंदगी

उनवान चिश्ती

वो मुस्कुरा के मोहब्बत से जब भी मिलते हैं

उनवान चिश्ती

सारी दुनिया में दाना है अपने घर में कुछ भी नहीं

उनवान चिश्ती

मिरे शानों पे उन की ज़ुल्फ़ लहराई तो क्या होगा

उनवान चिश्ती

किसी के फ़ैज़-ए-क़ुर्ब से हयात अब सँवर गई

उनवान चिश्ती

बच्चे भी अब देख के उस को हँसते हैं

उनवान चिश्ती

वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है

उम्मीद फ़ाज़ली

वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है

उम्मीद फ़ाज़ली

तुम हो जो कुछ कहाँ छुपाओगे

उम्मीद फ़ाज़ली

तुम हो जो कुछ कहाँ छुपाओगे

उम्मीद फ़ाज़ली

इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है

उम्मीद फ़ाज़ली

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