नज़र Poetry (page 25)

धुँद

सुबोध लाल साक़ी

ज़बाँ को अपनी गुनहगार करने वाला हूँ

सुबोध लाल साक़ी

ज़ब्त कर ग़म को कि जीने का हुनर आएगा

सुभाष पाठक ज़िया

सिलसिला ख़त्म कर चले आए

सुभाष पाठक ज़िया

अचानक किसी ने जो चिलमन उठा दी

सोज़ बरेलवी

कुछ इस तरह से है मेरे असर में तन्हाई

सिया सचदेव

जिस दिन से मिरी तुम से शनासाई हुई है

सिया सचदेव

अब तिरे शहर से चुप-चाप गुज़रना होगा

सिया सचदेव

उठो ज़माने के आशोब का इज़ाला करें

सिराजुद्दीन ज़फ़र

दिन को बहर-ओ-बर का सीना चीर कर रख दीजिए

सिराजुद्दीन ज़फ़र

ऐ अहल-ए-नज़र सोज़ हमीं साज़ हमीं हैं

सिराजुद्दीन ज़फ़र

यौम-ए-आज़ादी

सिराज लखनवी

यूँ सुबुक-दोश हूँ जीने का भी इल्ज़ाम नहीं

सिराज लखनवी

ये वो आज़माइश-ए-सख़्त है कि बड़े बड़े भी निकल गए

सिराज लखनवी

वो ज़कात-ए-दौलत-ए-सब्र भी मिरे चंद अश्कों के नाम से

सिराज लखनवी

निगाह-ए-यार यूँही और चंद पैमाने

सिराज लखनवी

न कुरेदूँ इश्क़ के राज़ को मुझे एहतियात-ए-कलाम है

सिराज लखनवी

मदद ऐ ख़याल-ए-माज़ी ज़रा आइना उठाना

सिराज लखनवी

ख़याल-ए-दोस्त न मैं याद-ए-यार में गुम हूँ

सिराज लखनवी

गुनाहगार हूँ ऐसा रह-ए-नजात में हूँ

सिराज लखनवी

बे-समझे-बूझे मोहब्बत की इक काफ़िर ने ईमान लिया

सिराज लखनवी

अश्क-ए-हसरत में क्यूँ लहू है अभी

सिराज लखनवी

अच्छा क़िसास लेना फिर आह-ए-आतिशीं से

सिराज लखनवी

अब इतनी अर्ज़ां नहीं बहारें वो आलम-ए-रंग-ओ-बू कहाँ है

सिराज लखनवी

तहक़ीक़ की नज़र सीं आख़िर कूँ हम ने देखा

सिराज औरंगाबादी

ग़ैर तरफ़ क्यूँकि नज़र कर सकूँ

सिराज औरंगाबादी

ऐ नूर-ए-नज़र मुंतज़िर-ए-वस्ल हूँ आ जा

सिराज औरंगाबादी

ऐ अक़्ल निकल जा कि धुआँ आह का नहीं है

सिराज औरंगाबादी

आई है तिरे इश्क़ की बाज़ी दिल-ओ-जाँ पर

सिराज औरंगाबादी

या-रब कहाँ गया है वो सर्व-ए-शोख़-रा'ना

सिराज औरंगाबादी

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