उम्र Poetry (page 30)

शाम कठिन है रात कड़ी है

राजेन्द्र नाथ रहबर

मरीज़-ए-हिज्र को सेहत से अब तो काम नहीं

रजब अली बेग सुरूर

ज़ौक़-ए-सुजूद ले गया मुझ को कहाँ कहाँ

राज कुमार सूरी नदीम

किसी का जिस्म हुआ जान-ओ-दिल किसी के हुए

रईस सिद्दीक़ी

हँसी हँसी में हर इक ग़म छुपाने आते हैं

रईस सिद्दीक़ी

किसी किसी की तरफ़ देखता तो मैं भी हूँ

रईस फ़रोग़

हाथ हमारे सब से ऊँचे हाथों ही से गिला भी है

रईस फ़रोग़

हमा-वक़्त जो मिरे साथ हैं ये उभरते डूबते साए से

रईस फ़रोग़

गलियों में आज़ार बहुत हैं घर में जी घबराता है

रईस फ़रोग़

फ़ज़ा मलूल थी मैं ने फ़ज़ा से कुछ न कहा

रईस फ़रोग़

आँखें जिन को देख न पाएँ सपनों में बिखरा देना

रईस फ़रोग़

आगही जिस मक़ाम पर ठहरी

रहमान जामी

साथ ले कर अपनी बर्बादी के अफ़्साने गए

राही शहाबी

ब-ज़ोम-ए-अक़्ल ये कैसा गुनाह मैं ने किया

इरफ़ान सत्तार

अब आ भी जाओ, बहुत दिन हुए मिले हुए भी

इरफ़ान सत्तार

कितनी दूर से चलते चलते ख़्वाब-नगर तक आई हूँ

इरम ज़ेहरा

अब इलाज-ए-दिल-ए-बीमार-ए-सहर हो कि न हो

इक़बाल उमर

वो चाँद है तो अक्स भी पानी में आएगा

इक़बाल साजिद

साए की तरह बढ़ न कभी क़द से ज़ियादा

इक़बाल साजिद

मिला तो हादिसा कुछ ऐसा दिल ख़राश हुआ

इक़बाल साजिद

रात भर कोई न दरवाज़ा खुला

इक़बाल नवेद

जब शाख़-ए-तमन्ना पे कोई फूल खिला है

इक़बाल मिनहास

रवाँ हूँ मैं

इक़बाल कौसर

सुपुर्द-ए-ग़म-ज़दगान-ए-सफ़-ए-वफ़ा हुआ मैं

इक़बाल कौसर

लब-ए-गुदाज़ पे अल्फ़ाज़-ए-सख़्त रहते हैं

इक़बाल कैफ़ी

कैफ़-ए-हयात तेरे सिवा कुछ नहीं रहा

इक़बाल कैफ़ी

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सर-ए-बज़्म रात ये क्या हुआ

इक़बाल अज़ीम

ठहरी ठहरी सी तबीअत में रवानी आई

इक़बाल अशहर

कभी कसक जुदाई की कभी महक विसाल की

इक़बाल अशहर

बैठ जाता था मैं थक कर अपने तन की छाँव में

इंतिख़ाब अालम

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