परेशां Poetry (page 5)

ज़ोर उस पर है न हालात पे क़ाबू यारो

शाहिद अख़्तर

शहर से बाहर निकलते रास्ते

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

मेरी चाहत पे न इल्ज़ाम लगाओ लोगो

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ख़्वाब खुलना है जो आँखों पे वो कब खुलता है

शाहीन अब्बास

रंग मैला न हुआ जामा-ए-उर्यानी का

शाह नसीर

काबा ओ दैर में जल्वा नहीं यकसाँ उन का

शाद अज़ीमाबादी

उन का ग़म भी न रहा पास तो फिर क्या होगा

शायर लखनवी

नींद से आँख वो मिल कर जागे

शायर लखनवी

ख़्वाब से आँख वो मल कर जागे

शायर लखनवी

तिरा वहशी कुछ आगे है जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ से

सेहर इश्क़ाबादी

ख़ून-ए-दिल से रह-ए-हस्ती को फ़रोज़ाँ कर लें

सत्यपाल जाँबाज़

सुब्ह को चैन न हो शाम को आराम न हो

सरवर आलम राज़

बू-ए-गुल फूलों में रहती थी मगर रह न सकी

साक़िब लखनवी

अपने दिल-ए-बेताब से मैं ख़ुद हूँ परेशाँ

साक़िब लखनवी

इज़्तिराब

सलमान अंसारी

कुछ तग़य्युर मिरे अहवाल-ए-परेशाँ में नहीं

सालिक देहलवी

कल नशात-ए-क़ुर्ब से मौसम बहार-अंदाज़ा था

सलीम अहमद

मैं तो कहता हूँ तुम्ही दर्द के दरमाँ हो ज़रूर

सलाम मछली शहरी

हर एक ज़र्रा बार-ए-अमानत से डर गया

सलाहुद्दीन नय्यर

यूँ परेशाँ कभी हम भी तो न थे

सख़ी लख़नवी

मैं हम-नफ़साँ जिस्म हूँ वो जाँ की तरह था

सज्जाद बाक़र रिज़वी

मैं हम-नफ़साँ जिस्म हूँ वो जाँ की तरह था

सज्जाद बाक़र रिज़वी

कार-ए-वहशत में भी मजबूर है इंसाँ अब तक

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हम-अस्र

साहिर लुधियानवी

एक तस्वीर-ए-रंग

साहिर लुधियानवी

गुलशन गुलशन फूल

साहिर लुधियानवी

दिल की तस्कीन को काफ़ी है परेशाँ होना

साहिर देहल्वी

हम अहल-ए-ज़र्फ़ कि ग़म-ख़ाना-ए-हुनर में रहे

सहर अंसारी

इश्क़ क्या है ख़ुद-फ़रामोशी मुसलसल इज़्तिराब

सग़ीर अहमद सग़ीर अहसनी

छलके हुए थे जाम परेशाँ थी ज़ुल्फ़-ए-यार

साग़र सिद्दीक़ी

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