कदम Poetry (page 29)
निगाह-ए-नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या क्या
फ़िराक़ गोरखपुरी
हो के सर-ता-ब-क़दम आलम-ए-असरार चला
फ़िराक़ गोरखपुरी
'फ़िराक़' इक नई सूरत निकल तो सकती है
फ़िराक़ गोरखपुरी
क़दम क़दम पे दोनों जुर्म-ए-इश्क़ में शरीक हैं
फ़िगार उन्नावी
छुप गया दिन क़दम बढ़ा राही
फ़िगार उन्नावी
कुछ काम तो आया दिल-ए-नाकाम हमारा
फ़िगार उन्नावी
टलते हैं कोई हाथ चले या ज़बाँ चले
फ़िदवी लाहौरी
टलते हैं कोई हाथ चले या ज़बाँ चले
फ़िदवी लाहौरी
सरहदें
फ़ाज़िल जमीली
हुई दिल टूटने पर इस तरह दिल से फ़ुग़ाँ पैदा
फ़ाज़िल अंसारी
है जो ख़ामोश बुत-ए-होश-रुबा मेरे बाद
फ़ज़ल हुसैन साबिर
पाया-ए-ख़िश्त-ओ-ख़ज़फ़ और गुहर से ऊँचा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
मैं ख़ुद हूँ नक़्द मगर सौ उधार सर पर है
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
चंद साँसें हैं मिरा रख़्त-ए-सफ़र ही कितना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
और क्या मुझ से कोई साहिब-नज़र ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
अब आ गए हो तो रफ़्तगाँ को भी याद रखना
फ़य्याज़ तहसीन
मैं कहाँ आया हूँ लाए हैं तिरी महफ़िल में
फ़े सीन एजाज़
ख़र्च जब हो गई जज़्बों की रक़म आप ही आप
फ़े सीन एजाज़
अच्छी-ख़ासी रुस्वाई का सबब होती है
फ़े सीन एजाज़
ख़्वाब गिरवी रख दिए आँखों का सौदा कर दिया
फ़ातिमा हसन
आँखों में न ज़ुल्फ़ों में न रुख़्सार में देखें
फ़ातिमा हसन
मुझे खोल ताज़ा हवा में रख
फर्रुख यार
कुश्तगान-ए-ख़ंजर-ए-तस्लीम-रा
फर्रुख यार
ख़बर मफ़क़ूद है लेकिन
फर्रुख यार
किसी बहाने भी दिल से अलम नहीं जाता
फ़र्रुख़ जाफ़री
अब के जुनूँ हुआ तो गरेबाँ को फाड़ कर
फ़र्रुख़ जाफ़री
वो अलग चुप है ख़ुद से शर्मा कर
फ़ारूक़ शफ़क़
भटक न जाता अगर ज़ात के बयाबाँ में
फ़ारूक़ नाज़की
सुनहरी दरवाज़े के बाहर
फ़ारूक़ नाज़की
मचलती है मिरे सीने में तेरी आरज़ू क्या क्या
फ़रोग़ हैदराबादी
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