रात Poetry (page 16)

था आईने के सामने चेहरा खुला हुआ

सय्यद अहमद शमीम

जागते में रात मुझ को ख़्वाब दिखलाया गया

सय्यद अहमद शमीम

थी नज़ारे की घात आँखों में

सय्यद अाग़ा अली महर

सीने में आग आँख सू-ए-दर लगी रहे

सय्यद अाग़ा अली महर

कट गई रात सुब्ह होती है

सय्यद अाग़ा अली महर

वाइज़-ए-शहर ख़ुदा है मुझे मा'लूम न था

सय्यद आबिद अली आबिद

मय हो साग़र में कि ख़ूँ रात गुज़र जाएगी

सय्यद आबिद अली आबिद

गर्दिश-ए-जाम नहीं रुक सकती

सय्यद आबिद अली आबिद

दिल है आईना-ए-हैरत से दो-चार आज की रात

सय्यद आबिद अली आबिद

ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर

स्वप्निल तिवारी

मुँह अँधेरे तेरी यादों से निकलना है मुझे

स्वप्निल तिवारी

चारों ओर समुंदर है

स्वप्निल तिवारी

ऐसी अच्छी सूरत निकली पानी की

स्वप्निल तिवारी

शिद्दत-ए-कर्ब से कराह उठा

सालेह नदीम

मेहर-ओ-माह भी लर्ज़ां हैं फ़ज़ा की बाँहों में

सुरूर बाराबंकवी

और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात

सुरूर बाराबंकवी

मैं दिन को रात के दरिया में जब उतार आया

सूरज नारायण

वो आज मुझ से जब मिली तो धुँद छट गई

सुलतान सुबहानी

कोई भी बात न थी वारदात से पहले

सुलतान सुबहानी

मौसम-ए-गुल कुंज-ए-गुलशन निकहत-ए-गेसू न हो

सुलतान रशक

जीने की तमन्ना है न मरने की तमन्ना

सुलतान निज़ामी

बाहर हिसार-ए-ग़म से फ़क़त देखने में था

सुलतान निज़ामी

तिलिस्म-ख़ाना-ए-दिल में है चार-सू रौशन

सुल्तान अख़्तर

तिलिस्म-ए-कार-ए-जहाँ का असर तमाम हुआ

सुल्तान अख़्तर

तन्हाइयों की बर्फ़ थी बिस्तर पे जा-ब-जा

सुल्तान अख़्तर

मिरी क़दीम रिवायत को आज़माने लगे

सुल्तान अख़्तर

मैं लड़खड़ाया तो मुझ को गले लगाने लगे

सुल्तान अख़्तर

किसी के वास्ते जीता है अब न मरता है

सुल्तान अख़्तर

बराए नाम सही दिन के हाथ पीले हैं

सुल्तान अख़्तर

बराए नाम सही दिन के हाथ पीले हैं

सुल्तान अख़्तर

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