रात Poetry (page 42)

कोई तो तर्क-ए-मरासिम पे वास्ता रह जाए

साबिर ज़फ़र

दिन को मिस्मार हुए रात को तामीर हुए

साबिर ज़फ़र

ये उम्र भर का सफ़र है इसी सहारे पर

साबिर वसीम

वो फूल था जादू-नगरी में जिस फूल की ख़ुश्बू भाई थी

साबिर वसीम

वो धूप वो गलियाँ वही उलझन नज़र आए

साबिर वसीम

तमाम मोजज़े सारी शहादतें ले कर

साबिर वसीम

राह में शहर-ए-तरब याद आया

साबिर वसीम

इक आग देखता था और जल रहा था मैं

साबिर वसीम

देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है

साबिर वसीम

असीर-ए-शाम हैं ढलते दिखाई देते हैं

साबिर वसीम

ख़्वाबों से न जाओ कि अभी रात बहुत है

साबिर दत्त

जी भर के तुम्हें देख लूँ तस्कीन हो कुछ तो

साबिर दत्त

फ़नकार

साबिर दत्त

इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है

साबिर दत्त

और मोड़ ने कहा

साबिर दत्त

आज की रात

साबिर दत्त

ख़्वाबों से न जाओ कि अभी रात बहुत है

साबिर दत्त

चाँदनी रात में शानों से ढलकती चादर

साबिर दत्त

वो और होंगे नुफ़ूस बे-दिल जो कहकशाएँ शुमारते हैं

साबिर

हमारी बेचैनी उस की पलकें भिगो गई है

साबिर

जब कभी हादसात ने मारा

सबीहा सबा, पाकिस्तान

रक्खे हर इक क़दम पे जो मुश्किल की आगही

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

आज गुज़रे हुए लम्हों को पुकारा जाए

सबा जायसी

जो हमारे सफ़र का क़िस्सा है

सबा अकबराबादी

कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं

सबा अफ़ग़ानी

मोहब्बत में जीना नई बात है

साइल देहलवी

ये रात दिन का बदलना नज़र में रहता है

सादुल्लाह शाह

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

मोम पिघलाता रहा तेरा ख़याल

रुख़साना नूर

जब न तब सुनिए तो करता है वो इक़रार बग़ैर

राय सरब सुख दिवाना

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