साथ Poetry (page 26)

ग़ुबार-ए-दर्द में राह-ए-नजात ऐसा ही

शहराम सर्मदी

पहले जैसा नहीं रहा हूँ

शहनवाज़ ज़ैदी

कभी क़लम कभी नेज़ों पे सर उछलते हैं

शाहजहाँ बानो याद

सवाद-ए-शाम से ता-सुब्ह-ए-बे-किनार गई

शाहिदा हसन

कोई सर्द हवा लब-ए-बाम चली

शाहिदा हसन

हवा पे चल रहा है चाँद राह-वार की तरह

शाहिदा हसन

चाँद के साथ जल उठी मैं भी

शाहिदा हसन

चाँद के साथ जल उठी मैं भी

शाहिदा हसन

फलों के साथ कहीं घोंसले न गिर जाएँ

शाहिद ज़की

ज़र-ए-सरिश्क फ़ज़ा में उछालता हुआ मैं

शाहिद ज़की

ज़ंजीर कट के क्या गिरी आधे सफ़र के बीच

शाहिद ज़की

मिरे ख़ुदा किसी सूरत उसे मिला मुझ से

शाहिद ज़की

बिन माँगे मिल रहा हो तो ख़्वाहिश फ़ुज़ूल है

शाहिद ज़की

कूचा-ए-संग-ए-मलामत के सब आसार के साथ

शाहिद कमाल

ग़मों की रात है और इतनी मुख़्तसर भी नहीं

शाहिद कमाल

अपनी तन्हाई का सामान उठा लाए हैं

शाहिद कमाल

नींद से आँख खुली है अभी देखा क्या है

शाहिद कबीर

सीने हैं चाक और गरेबाँ सिले हुए

शाहिद इश्क़ी

शहर-ए-निगाराँ में फिरते हैं हम आवारा रात ढले

शाहिद इश्क़ी

लुत्फ़ से तेरे सिवा दर्द महक जाता है

शाहिद इश्क़ी

लज़्ज़त-ए-संग न पूछो लोगो उम्र अगर हाथ आए फिर

शाहिद इश्क़ी

कुछ अपनी बात कहो कुछ मिरी सुनो मत सो

शाहिद इश्क़ी

इक न आने वाले का इंतिज़ार करते हैं

शाहिद इश्क़ी

चाँद माँगा न कभी हम ने सितारे माँगे

शाहिद अख़्तर

आप के इज़्न-ए-मुलाक़ात से जी डरता है

शाहिद अख़्तर

दिल के ज़ख़्मों की लवें और उभारो लोगो

शाहिद अहमद शोएब

यूँ उलझ कर रह गई है तार-ए-पैराहन में रात

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

दुनिया ने बस थका ही दिया काम कम हुए

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

सियाही गिरती रहे और दिया ख़राब न हो

शाहीन अब्बास

मैं हुआ तेरा माजरा तू मिरा माजरा हुआ

शाहीन अब्बास

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