साथ Poetry (page 60)

है वही एक मेरे सिवा और मैं

फ़रहत नदीम हुमायूँ

उसे ख़बर थी कि हम विसाल और हिज्र इक साथ चाहते हैं

फ़रहत एहसास

मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है

फ़रहत एहसास

तहरीर की फ़ुर्सत

फ़रहत एहसास

सुकूत

फ़रहत एहसास

साँप

फ़रहत एहसास

हमवारी

फ़रहत एहसास

अगर मैं चीख़ूँ

फ़रहत एहसास

यही हिसाब-ए-मोहब्बत दोबारा कर के लाओ

फ़रहत एहसास

वो मेरी जाँ के सदफ़ में गुहर सा रहता है

फ़रहत एहसास

ठोकरें खा के सँभलना नहीं आता है मुझे

फ़रहत एहसास

सहरा के संगीन सफ़र में आब-रसानी कम न पड़े

फ़रहत एहसास

ना-क़ाबिल-ए-यक़ीं था अगरचे शुरूअ' में

फ़रहत एहसास

मिरी मोहब्बत में सारी दुनिया को इक खिलौना बना दिया है

फ़रहत एहसास

मिरे शे'रों में फ़नकारी नहीं है

फ़रहत एहसास

मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं

फ़रहत एहसास

ख़लल आया न हक़ीक़त में न अफ़्साना बना

फ़रहत एहसास

हम अपने आप को अपने से कम भी करते रहते हैं

फ़रहत एहसास

हमें जब अपना तआरुफ़ कराना पड़ता है

फ़रहत एहसास

हद्द-ए-बदन में मेरी ज़ात आ नहीं रही है

फ़रहत एहसास

इक हवा आई है दीवार में दर करने को

फ़रहत एहसास

देखो अभी लहू की इक धार चल रही है

फ़रहत एहसास

दबा पड़ा है कहीं दश्त में ख़ज़ाना मिरा

फ़रहत एहसास

चराग़-ए-शहर से शम-ए-दिल-ए-सहरा जलाना

फ़रहत एहसास

मैं बे-ख़याल कभी धूप में निकल आऊँ

फ़रहत अब्बास शाह

तुम्हारे ख़्वाब मिरे साथ साथ चलते हैं

फ़रहत अब्बास शाह

पहुँच के हम सर-ए-मंज़िल जिन्हें भुला न सके

फ़रीद जावेद

पहुँच के हम सर-ए-मंज़िल जिन्हें भुला न सके

फ़रीद जावेद

न ग़ुरूर है ख़िरद को न जुनूँ में बाँकपन है

फ़रीद जावेद

न ग़ुरूर है ख़िरद को न जुनूँ में बाँकपन है

फ़रीद जावेद

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