साथ Poetry (page 61)

क्या हो गया कैसी रुत पलटी मिरा चैन गया मिरी नींद गई

फ़रीद जावेद

ग़ुबार दिल पे बहुत आ गया है धो लें आज

फ़रीद जावेद

कुछ उन की जफ़ा उन का सितम याद नहीं है

फ़रीद इशरती

राख उड़ती हुई बालों में नज़र आती है

फ़रह इक़बाल

हमें तो साथ चलने का हुनर अब तक नहीं आया

फ़रह इक़बाल

दिमाग़ अहल-ए-मोहब्बत का साथ देता नहीं

फ़राग़ रोहवी

नवाह-ए-जाँ में किसी के उतरना चाहा था

फ़राग़ रोहवी

कमी ज़रा सी अगर फ़ासले में आ जाए

फ़राग़ रोहवी

हमारे साथ उमीद-ए-बहार तुम भी करो

फ़राग़ रोहवी

फटी मश्कें लिए दिन-रात दरिया देखने वाले

फ़क़ीह हैदर

मैं ख़ुश हुआ कि बूद में रक्खा गया मुझे

फ़क़ीह हैदर

जिस्म में गूँजता है रूह पे लिक्खा दुख है

फ़क़ीह हैदर

ज़ीस्त का हासिल बनाया दिल जो गोया कुछ न था

फ़ानी बदायुनी

वो जी गया जो इश्क़ में जी से गुज़र गया

फ़ानी बदायुनी

तिरी तिरछी नज़र का तीर है मुश्किल से निकलेगा

फ़ानी बदायुनी

क़तरा दरिया-ए-आश्नाई है

फ़ानी बदायुनी

हर साँस के साथ जा रहा हूँ

फ़ानी बदायुनी

आँख उठाई ही थी कि खाई चोट

फ़ानी बदायुनी

वो जाने कितना सर-ए-बज़्म शर्मसार हुआ

फ़ना निज़ामी कानपुरी

मेरे चेहरे से ग़म आश्कारा नहीं

फ़ना निज़ामी कानपुरी

माइल-ब-करम मुझ पर हो जाएँ तो अच्छा हो

फ़ना बुलंदशहरी

हुस्न-ए-बुताँ का इश्क़ मेरी जान हो गया

फ़ना बुलंदशहरी

अँधेरे लाख छा जाएँ उजाला कम नहीं होता

फ़ना बुलंदशहरी

बिल्कुल तुम सा और तुम्हारा लगता हूँ

फख़्र अब्बास

बिजली सी इक और गिरा दी ज़ालिम ने

फख़्र अब्बास

बहुत क़दीम नहीं कल का वाक़िआ है ये

फ़ैज़ान हाशमी

मिला रहा हूँ तिरा हुस्न काएनात के साथ

फ़ैज़ान हाशमी

हम ने सहरा को सजाया था गुलिस्ताँ की तरह

फ़ैज़ुल हसन

मामूली बे-कार समझने वाले मुझ से दूर रहें

फ़ैज़ आलम बाबर

'सज्जाद-ज़हीर' के नाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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