साथ Poetry (page 63)

इन उजड़ी बस्तियों का कोई तो निशाँ रहे

एज़ाज़ अहमद आज़र

सलीक़ा इतना तो ऐ शौक़-ए-ख़ुश-कलाम आए

एज़ाज़ अफ़ज़ल

जग में आता है हर बशर तन्हा

एलिज़ाबेथ कुरियन मोना

जिस को देखो बेवफ़ा है आइनों के शहर में

एजाज़ वारसी

उसे ये हक़ है कि वो मुझ से इख़्तिलाफ़ करे

एजाज़ रहमानी

रंग मौसम के साथ लाए हैं

एजाज़ रहमानी

तब हज़ारों अँधेरों से

एजाज़ रही

काले मौसमों की आख़िरी रात

एजाज़ रही

उस ने देखा था अजब एक तमाशा मुझ में

एजाज़ उबैद

नए सफ़र में जो पिछले सफ़र के साथी थे

एजाज़ उबैद

गले लग कर मिरे वो जाने हँसता था कि रोता था

एजाज़ उबैद

पाया न कुछ ख़ला के सिवा अक्स-ए-हैरती

एजाज़ गुल

दुश्मनों के दरमियान सुल्ह

एजाज़ गुल

पेचाक-ए-उम्र अपने सँवार आइने के साथ

एजाज़ गुल

अपना अपना रंग

एजाज़ फ़ारूक़ी

पहचान

एजाज़ अहमद एजाज़

मेरी मौत के मसीहा!

एजाज़ अहमद एजाज़

तू मर्द-ए-मोमिन है अपनी मंज़िल को आसमानों पे देख नादाँ

एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी

तिरे बदन की नज़ाकतों का हुआ है जब हम-रिकाब मौसम

एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी

शुऊर-ए-नौ-उम्र हूँ न मुझ को मता-ए-रंज-ओ-मलाल देना

एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी

हुसूल-ए-मक़्सद में आख़िरश यूँ रहेगी क़िस्मत दख़ील कब तक

एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी

चराग़ दिल का था रौशन बुझा गया पानी

एहतिशाम अख्तर

दिल की शगुफ़्तगी के साथ राहत-ए-मय-कदा गई

एहसान दानिश

यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे

एहसान दानिश

वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म उठाए जा

एहसान दानिश

परस्तिश-ए-ग़म का शुक्रिया क्या तुझे आगही नहीं

एहसान दानिश

अब कहो कारवाँ किधर को चले

एहसान दानिश

पुर-लुत्फ़ सुकूँ-बख़्श हवाएँ भी बहुत थीं

डॉक्टर आज़म

ख़ुदा भी जानता है ख़ूब जो मक्कार बैठे हैं

डॉक्टर आज़म

रात से दिन का वो जो रिश्ता थी

दिनेश नायडू

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