साथ Poetry (page 65)

मोहब्बत की मता-ए-जावेदानी ले के आया हूँ

दर्शन सिंह

चश्म-ए-बीना हो तो क़ैद-ए-हरम-ओ-तूर नहीं

दर्शन सिंह

हम भी जरस की तरह तो इस क़ाफ़िले के साथ

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

तेरी गली में मैं न चलूँ और सबा चले

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

रब्त है नाज़-ए-बुताँ को तो मिरी जान के साथ

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

दरिंदे साथ रहना चाहते हैं आदमी के

दानियाल तरीर

तमन्ना का दूसरा क़दम

दानियाल तरीर

खंडर ये फिर बसाने का इरादा ही नहीं था

दानियाल तरीर

जरस और सारबानों तक पहुँचना चाहता है

दानियाल तरीर

अजब रंग-ए-तिलस्म-ओ-तर्ज़-ए-नौ है

दानियाल तरीर

आख़िरी वक़्त तलक साथ अंधेरों ने दिया

दानिश अलीगढ़ी

ज़िंदगी कर गई तूफ़ाँ के हवाले मुझ को

दानिश अलीगढ़ी

क्या ख़बर थी मुन्हरिफ़ अहल-ए-जहाँ हो जाएँगे

दानिश अलीगढ़ी

उन के मिलने का ब-ज़ाहिर तो यक़ीं कोई नहीं

दामोदर ठाकुर ज़की

यूँ मेरे साथ दफ़्न दिल-ए-बे-क़रार हो

दाग़ देहलवी

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं

दाग़ देहलवी

ना-रवा कहिए ना-सज़ा कहिए

दाग़ देहलवी

मुमकिन नहीं कि तेरी मोहब्बत की बू न हो

दाग़ देहलवी

मुझ सा न दे ज़माने को परवरदिगार दिल

दाग़ देहलवी

होश आते ही हसीनों को क़यामत आई

दाग़ देहलवी

फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं

दाग़ देहलवी

क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले

चरख़ चिन्योटी

क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले

चरख़ चिन्योटी

जो आँसुओं को न चमकाए वो ख़ुशी क्या है

चरख़ चिन्योटी

लाख कुछ न हम कहते बे-ज़बाँ रहे होते

चरण सिंह बशर

कैसा वो मौसम था ये तो समझ न पाए हम

चंद्र प्रकाश शाद

हिजाब बन के वो मेरी नज़र में रहता है

चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी

ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में

चाँदनी पांडे

जले चराग़ बुझाने की ज़िद नहीं करते

चाँदनी पांडे

फ़ित्ना-ए-रोज़गार की बातें

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

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