साथ Poetry (page 67)

गर्दिश-ए-बख़्त से बढ़ती ही चली जाती हैं

बेखुद बदायुनी

शिकवा सुन कर जो मिज़ाज-ए-बुत-ए-बद-ख़ू बदला

बेखुद बदायुनी

साथ साथ अहल-ए-तमन्ना का वो मुज़्तर जाना

बेखुद बदायुनी

दर्द-ए-दिल में कमी न हो जाए

बेखुद बदायुनी

उदास काग़ज़ी मौसम में रंग ओ बू रख दे

बेकल उत्साही

नए ज़माने में अब ये कमाल होने लगा

बेकल उत्साही

हम चटानों की तरह साहिल पे ढाले जाएँगे

बेकल उत्साही

वो ले गया है मिरी आँख अपनी बस्ती में

बेदार सरमदी

किरन में फिर से बदलने लगा ख़याल उस का

बेदार सरमदी

ये साक़ी की करामत है कि फ़ैज़-ए-मय-परस्ती है

बेदम शाह वारसी

कभी यहाँ लिए हुए कभी वहाँ लिए हुए

बेदम शाह वारसी

मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर न इतना उछल के चल

बयान मेरठी

रात उस तुनुक-मिज़ाज से कुछ बात बढ़ गई

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

सब काएनात-ए-हुस्न का हासिल लिए हुए

बासित भोपाली

कोई मेयार-ए-मोहब्बत न रहा मेरे बा'द

बासित भोपाली

हयात-ओ-मौत का इक सिलसिला है

बासित भोपाली

अहद के साथ ये भी हो इरशाद

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

जब मिलेंगे कि अब मिलेंगे आप

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

यूँ खुल गया है राज़-ए-शिकस्त-ए-तलब कभी

बशीर ज़ैदी असीर

किसे ख़बर है मैं दिल से कि जाँ से गुज़रूँगा

बशीर सैफ़ी

हब्स के दिनों में भी घर से कब निकलते हैं

बशीर सैफ़ी

इक लम्हा भी गुज़ारूँ भला क्यूँ किसी के साथ

बशीर महताब

तज़्किरे में तिरे इक नाम को यूँ जोड़ दिया

बशीर फ़ारूक़ी

उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे

बशीर बद्र

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

बशीर बद्र

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा था

बशीर बद्र

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है

बशीर बद्र

मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है

बशीर बद्र

मिरे साथ चलने वाले तुझे क्या मिला सफ़र में

बशीर बद्र

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