साथ Poetry (page 66)

दौर-ए-निगाह-ए-साक़ी-ए-मस्ताना एक है

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

मर्सिया गोपाल कृष्ण गोखले

चकबस्त ब्रिज नारायण

पंछी ते परदेसी.....

बुशरा एजाज़

ख़ुशियाँ थीं बेवफ़ा न रहीं ज़िंदगी के साथ

बबल्स होरा सबा

होती नहीं रसाई-ए-बर्क़-ए-तपाँ कहाँ

ब्रहमा नन्द जलीस

देने वाले ये ज़िंदगी दी है

ब्रहमा नन्द जलीस

अल्लाह अल्लाह वस्ल की शब इस क़दर ए'जाज़ है

बूम मेरठी

हुस्न भी कम्बख़्त कब ख़ाली है सोज़-ए-इश्क़ से

बिस्मिल सईदी

वही होती है रहबर जो तमन्ना दिल में होती है

बिस्मिल सईदी

चमन को लग गई किस की नज़र ख़ुदा जाने

बिस्मिल अज़ीमाबादी

अब रहा क्या है जो अब आए हैं आने वाले

बिस्मिल अज़ीमाबादी

अब दम-ब-ख़ुद हैं नब्ज़ की रफ़्तार देख कर

बिस्मिल अज़ीमाबादी

जीने वाला ये समझता नहीं सौदाई है

बिस्मिल इलाहाबादी

एआद-ए-हिकायतें

बिमल कृष्ण अश्क

जब चौदहवीं का चाँद निकलता दिखाई दे

बिमल कृष्ण अश्क

हम से भली चाल चली चाँदनी

बिमल कृष्ण अश्क

अनहोनी कुछ ज़रूर हुई दिल के साथ आज

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

बे-तअल्लुक़ सारे रिश्ते कौन किस का आश्ना

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

घर में जब बेटियाँ नहीं होंगी

बिल्क़ीस ख़ान

मेरी एक बुरी आदत थी

बिलाल अहमद

शफ़क़ से बाम-ए-फ़लक लाला-गूँ भी होता है

बिलाल अहमद

सब ने होंटों से लगा कर तोड़ डाला है मुझे

भारत भूषण पन्त

चाहतों के ख़्वाब की ताबीर थी बिल्कुल अलग

भारत भूषण पन्त

मुँह फेर कर वो कहते हैं बस मान जाइए

बेख़ुद देहलवी

मेरे हम-राह मिरे घर पे भी आफ़त आई

बेख़ुद देहलवी

दिल चुरा ले गई दुज़्दीदा-नज़र देख लिया

बेख़ुद देहलवी

बेचने आए कोई क्या दिल-ए-शैदा ले कर

बेख़ुद देहलवी

बनी थी दिल पे कुछ ऐसी की इज़्तिराब न था

बेख़ुद देहलवी

ऐसा बना दिया तुझे क़ुदरत ख़ुदा की है

बेख़ुद देहलवी

शिकवा सुन कर जो मिज़ाज-ए-बुत-ए-बद-ख़ू बदला

बेखुद बदायुनी

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