साथ Poetry (page 68)

मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ

बशीर बद्र

मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा

बशीर बद्र

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से

बशीर बद्र

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे

बशीर बद्र

एक औरत से वफ़ा करने का ये तोहफ़ा मिला

बशीर बद्र

बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम

बशीर बद्र

बहुत अजीब है ये क़ुर्बतों की दूरी भी

बशीर बद्र

यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो

बशीर बद्र

ये चराग़ बे-नज़र है ये सितारा बे-ज़बाँ है

बशीर बद्र

वो अपने घर चला गया अफ़्सोस मत करो

बशीर बद्र

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं

बशीर बद्र

सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी

बशीर बद्र

सोए कहाँ थे आँखों ने तकिए भिगोए थे

बशीर बद्र

सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है

बशीर बद्र

रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना

बशीर बद्र

पिछली रात की नर्म चाँदनी शबनम की ख़ुनकी से रचा है

बशीर बद्र

परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता

बशीर बद्र

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला

बशीर बद्र

मिरी ग़ज़ल की तरह उस की भी हुकूमत है

बशीर बद्र

मेरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे

बशीर बद्र

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बँधा हुआ

बशीर बद्र

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई

बशीर बद्र

कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए

बशीर बद्र

ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे

बशीर बद्र

इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को

बशीर बद्र

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

बशीर बद्र

अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ

बशीर बद्र

हम बयाबानों में घूमे शहर की सड़कों पे टहले

बशीर मुंज़िर

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