साथ Poetry (page 69)

अच्छे कभी बुरे हैं हालात आदमी के

बशीर मुंज़िर

इन चटख़्ते पत्थरों पर पाँव धरना ध्यान से

बशीर अहमद बशीर

कहते कहते कुछ बदल देता है क्यूँ बातों का रुख़

बशर नवाज़

मुझे कहना है

बशर नवाज़

कोई सनम तो हो कोई अपना ख़ुदा तो हो

बशर नवाज़

जब छाई घटा लहराई धनक इक हुस्न-ए-मुकम्मल याद आया

बशर नवाज़

घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं

बशर नवाज़

न रहे नामा ओ पैग़ाम के लाने वाले

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

मिसाल-ए-तार-ए-नज़र क्या नज़र नहीं आता

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वक़्त रस्ते में खड़ा है कि नहीं

बाक़ी सिद्दीक़ी

सुब्ह का भेद मिला क्या हम को

बाक़ी सिद्दीक़ी

नद्दी के उस पार खड़ा इक पेड़ अकेला

बाक़ी सिद्दीक़ी

दिल से बाहर हैं ख़रीदार अभी

बाक़ी सिद्दीक़ी

अपनी धूप में भी कुछ जल

बाक़ी सिद्दीक़ी

उड़े नहीं हैं उड़ाए हुए परिंदे हैं

बाक़ी अहमदपुरी

उदास बाम है दर काटने को आता है

बाक़ी अहमदपुरी

सिपाह-ए-इशरत पे फ़ौज-ए-ग़म ने जो मिल के मरकब बहम उठाए

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

रखता है यूँ वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम दोश पर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

आवे जो नाज़ से मिरा वो बुत-ए-सीम-बर ब-बर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

आवे जो नाज़ से मिरा वो बुत-ए-सीम-बर ब-बर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

पग पग फूल खिले थे लेकिन तन-मन में थी आग

बाक़र नक़वी

गूँजता शहरों में तन्हाई का सन्नाटा तो है

बाक़र मेहदी

अगरचे दिल को ले साथ अपने आया अश्क मिरा

बाक़र आगाह वेलोरी

खुला मकान है हर एक ज़िंदगी 'आज़र'

बलवान सिंह आज़र

मिरे सफ़र में ही क्यूँ ये अज़ाब आते हैं

बलवान सिंह आज़र

दो क़दम साथ क्या चला रस्ता

बलवान सिंह आज़र

बे-ख़ुदी साथ है मज़े में हूँ

बलवान सिंह आज़र

हमें इस तरह ही होना था आबाद

बकुल देव

यकायक अक्स धुँदलाने लगे हैं

बकुल देव

दीदा-ए-बे-रंग में ख़ूँ-रंग मंज़र रख दिए

बख़्श लाइलपूरी

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