साथ Poetry (page 59)

होश ओ ख़िरद गँवा के तिरे इंतिज़ार में

फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी

कुश्तगान-ए-ख़ंजर-ए-तस्लीम-रा

फर्रुख यार

कोई मौसम हो कुछ भी हो सफ़र करना ही पड़ता है

फ़र्रुख़ जाफ़री

जाने क्या ऐसा उसे मुझ में नज़र आया था

फ़र्रुख़ जाफ़री

मैं तो लम्हात की साज़िश का निशाना ठहरा

फ़ारूक़ शमीम

ग़ज़लों में अब वो रंग न रानाई रह गई

फ़ारूक़ शमीम

अपनी पहचान कोई ज़माने में रख

फ़ारूक़ शफ़क़

मातम-ए-नीम-ए-शब

फ़ारूक़ नाज़की

तेरी मर्ज़ी न दे सबात मुझे

फ़ारूक़ नाज़की

नई बासी कोई ख़बर दे दे

फ़ारूक़ नाज़की

अपनी ग़ज़ल को ख़ून का सैलाब ले गया

फ़ारूक़ नाज़की

सलीब-ए-मौजा-ए-आब-ओ-हवा पे लिक्खा हूँ

फ़ारूक़ मुज़्तर

जो रहा यूँ ही सलामत मिरा जज़्ब-ए-वालहाना

फ़ारूक़ बाँसपारी

ब-रोज़-ए-हश्र मिरे साथ दिल-लगी ही तो है

फ़ारूक़ बाँसपारी

जब हम पहली बार मिले थे

फ़ारूक़ बख़्शी

उस के होंटों पे बद-दुआ' भी नहीं

फ़ारूक़ बख़्शी

इक पल कहीं रुके थे सफ़र याद आ गया

फ़ारूक़ बख़्शी

बिछड़ना मुझ से तो ख़्वाबों में सिलसिला रखना

फ़ारूक़ बख़्शी

ये वक़्त ज़िंदगी की अदाएँ भी ले गया

फ़ारूक़ अंजुम

मैं मो'तबर हूँ इश्क़ मिरा मो'तबर नहीं

फ़ारूक़ अंजुम

तुम्हारे साथ ही उस को भी डूब जाना है

फ़ारिग़ बुख़ारी

पुकारा जब मुझे तन्हाई ने तो याद आया

फ़ारिग़ बुख़ारी

मैं कि अब तेरी ही दीवार का इक साया हूँ

फ़ारिग़ बुख़ारी

हर एक रास्ते का हम-सफ़र रहा हूँ मैं

फ़ारिग़ बुख़ारी

हमें सलीक़ा न आया जहाँ में जीने का

फ़ारिग़ बुख़ारी

शाम कहती है कोई बात जुदा सी लिक्खूँ

फ़रहत शहज़ाद

मैं अपने-आप से बरहम था वो ख़फ़ा मुझ से

फ़रहत शहज़ाद

दो झुकी आँखों का पहुँचा जब मिरे दिल को सलाम

फ़रहत शहज़ाद

आँख को जकड़े थे कल ख़्वाब अज़ाबों के

फ़रहत शहज़ाद

शुऊर-ओ-फ़िक्र की तज्दीद का गुमाँ तो हुआ

फ़रहत क़ादरी

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