साथ Poetry (page 73)

डराने वाला सुन कर डर रहा है

आयुष चराग़

सफ़र में फ़ासलों के साथ बादबान खो दिया

अय्यूब ख़ावर

आँख की दहलीज़ से उतरा तो सहरा हो गया

अय्यूब ख़ावर

दीवानगी ने ख़ूब करिश्मे दिखाए हैं

अयाज़ झाँसवी

निहत्ते आदमी पे बढ़ के ख़ंजर तान लेती है

औरंगज़ेब

आइने से गुज़रने वाला था

औरंगज़ेब

उभरते चाँद सितारों का तज़्किरा भी करो

औलाद अली रिज़वी

ख़दशे थे शाम-ए-हिज्र के सुब्ह-ए-ख़ुशी के साथ

औलाद अली रिज़वी

इक थकन क़ुव्वत-ए-इज़हार में आ जाती है

अतुल अजनबी

फ़ज़ा में हाथ तो उट्ठे थे एक साथ कई

अतीक़ुल्लाह

वो

अतीक़ुल्लाह

मैं कि तुम पे बाज़ हूँ

अतीक़ुल्लाह

अब्बा के नाम

अतीक़ुल्लाह

तू भी तो एक लफ़्ज़ है इक दिन मिरे बयाँ में आ

अतीक़ुल्लाह

मिरे सुपुर्द कहाँ वो ख़ज़ाना करता था

अतीक़ुल्लाह

ख़्वाबों की किर्चियाँ मिरी मुट्ठी में भर न जाए

अतीक़ुल्लाह

बहुत दिनों में कहीं रास्ते बदलते थे

अतीक़ुल्लाह

गिरती हुई दीवार का साया था तिरा साथ

अतहर राज़

फूलों से बहारों में जुदा थे तो हमीं थे

अतहर राज़

ग़म के बादल दिल-ए-नाशाद पे ऐसे छाए

अतहर राज़

अगर यक़ीन न रखते गुमान तो रखते

अतहर नासिक

साया मेरा साया वो

अतहर नफ़ीस

क्या बात निराली है मुझ में किस फ़न में आख़िर यकता हूँ

अतहर नफ़ीस

हम भी बदल गए तिरी तर्ज़-ए-अदा के साथ साथ

अतहर नफ़ीस

'अतहर' तुम ने इश्क़ किया कुछ तुम भी कहो क्या हाल हुआ

अतहर नफ़ीस

किस दर्जा मिरे शहर की दिलकश है फ़ज़ा भी

अतहर नादिर

भरोसे का क़त्ल

अतीया दाऊद

जिस को देखो वो गिरफ़्तार-ए-बला लगता है

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

अल्फ़ाज़ न दे पाएँ अगर साथ बयाँ का

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

हर्फ़ लर्ज़ां हैं कि होंटों पे वो आएँ कैसे?

अतीक़ असर

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