साथ Poetry (page 74)

ग़म ये नहीं कि ग़म से मुलाक़ात हुई

अतीक़ असर

जिस की ख़ातिर मैं ने दुनिया की तरफ़ देखा न था

अतीक़ अंज़र

गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था

अतीक़ अंज़र

दिल के आँगन में तिरी याद का तारा चमका

अतीक़ अंज़र

चंद लम्हों को सही था साथ में रहना बहुत

अतीक़ इलाहाबादी

अगरचे लाई थी कल रात कुछ नजात हवा

अतीक़ इलाहाबादी

गुमाँ के तन पे यक़ीं का लिबास रहने दो

अतीब एजाज़

बिखर बिखर गया इक मौज-ए-राएगाँ की तरह

अताउर्रहमान क़ाज़ी

किसे दिमाग़ कि उलझे तिलिस्म-ए-ज़ात के साथ

अताउर्रहमान क़ाज़ी

शोहरत-ए-फ़न बहुत हुई दाद कमाल दे गए

अताउर्रहमान जमील

किसी और को मैं तिरे सिवा नहीं चाहता

अताउल हसन

दम-ब-दम एक साथ बैठे हैं

अताउल हसन

वो एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है

अताउल हक़ क़ासमी

वह एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है

अताउल हक़ क़ासमी

दर्द की धूप में सहरा की तरह साथ रहे

अता शाद

पारसाओं ने बड़े ज़र्फ़ का इज़हार किया

अता शाद

बड़ा कठिन है रास्ता जो आ सको तो साथ दो

अता शाद

ढला जो दिन तो गया नूर-ए-आफ़्ताब भी साथ

अता हुसैन कलीम

सरमाया-दारी

असरार-उल-हक़ मजाज़

रात और रेल

असरार-उल-हक़ मजाज़

इंक़लाब

असरार-उल-हक़ मजाज़

आहंग-ए-नौ

असरार-उल-हक़ मजाज़

शायर-ए-आज़म

असरार जामई

फ़न अस्ल में पिन्हाँ है दिल-ए-ज़ार के अंदर

असरार अकबराबादी

वस्ल की जो ख़्वाहिश है

असरा रिज़वी

मैं सच तो कह दूँ पर उस को कहीं बुरा न लगे

असरा रिज़वी

तेरा सूरज आएगा

असलम राशिद

मुसलसल धूप से पाला पड़ा है

असलम राशिद

मुझे दरिया बनाना चाहती है

असलम राशिद

इक क़दम उठ गया रवानी में

असलम राशिद

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