छाया Poetry (page 19)

मुस्तक़िल रोने से दिल की बे-कली बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त

किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है

भारत भूषण पन्त

ख़ुद पर जो ए'तिमाद था झूटा निकल गया

भारत भूषण पन्त

आब की तासीर में हूँ प्यास की शिद्दत में हूँ

भारत भूषण पन्त

सुब्ह क़यामत आएगी कोई न कह सका कि यूँ

बयान मेरठी

या रब न हिन्द ही में ये माटी ख़राब हो

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

कोई किसी का कहीं आश्ना नहीं देखा

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

जब से मिरे रक़ीब का रस्ता बदल गया

बशीर महताब

वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है

बशीर बद्र

फिर याद बहुत आएगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम

बशीर बद्र

मेरे सीने पर वो सर रक्खे हुए सोता रहा

बशीर बद्र

इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को

बशीर बद्र

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा

बशीर बद्र

जुदा भी हो के वो इक पल कभी जुदा न हुआ

बशीर अहमद बशीर

इन चटख़्ते पत्थरों पर पाँव धरना ध्यान से

बशीर अहमद बशीर

हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में

बशीर अहमद बशीर

ऐसा तह-ए-अफ़्लाक ख़राबा नहीं कोई

बशीर अहमद बशीर

हिन्द के जाँ-बाज़ सिपाही

बर्क़ देहलवी

तिरी निगाह का अंदाज़ क्या नज़र आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

रंग-ए-दिल रंग-ए-नज़र याद आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

क्या पता हम को मिला है अपना

बाक़ी सिद्दीक़ी

मुझे तो इश्क़ में अब ऐश-ओ-ग़म बराबर है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

ख़ामुशी

बाक़र मेहदी

दश्त-ए-वफ़ा में ठोकरें खाने का शौक़ था

बाक़र मेहदी

बरसों पढ़ कर सरकश रह कर ज़ख़्मी हो कर समझा मैं

बाक़र मेहदी

अजीब दिल में मिरे आज इज़्तिराब सा है!

बाक़र मेहदी

माँ

बक़ा बलूच

क्या पूछते हो मैं कैसा हूँ

बक़ा बलूच

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

जो झुक के मिलते थे जलसों में मेहरबाँ की तरह

बदनाम नज़र

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