छाया Poetry (page 9)

बाकिरा

साक़ी फ़ारुक़ी

शहर का शहर हुआ जान का प्यासा कैसा

साक़ी फ़ारुक़ी

पाँव मारा था पहाड़ों पे तो पानी निकला

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं वो हूँ जिस पे अब्र का साया पड़ा नहीं

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं तेरे ज़ुल्म दिखाता हूँ अपना मातम करने के लिए

साक़ी फ़ारुक़ी

लोग थे जिन की आँखों में अंदेशा कोई न था

साक़ी फ़ारुक़ी

जान प्यारी थी मगर जान से बे-ज़ारी थी

साक़ी फ़ारुक़ी

आईना-दिल दाग़-ए-तमन्ना के लिए था

समद अंसारी

धूप पीछा नहीं छोड़ेगी ये सोचा भी नहीं

सलमा शाहीन

यक़ीं की धूप में साया भी कुछ गुमान का है

सलीम सिद्दीक़ी

फिर न आएगा ये लम्हा सोच ले

सलीम शहज़ाद

मौसम का ज़हर दाग़ बने क्यूँ लिबास पर

सलीम शाहिद

दर्द की ख़ुश्बू से सारा घर मोअ'त्तर हो गया

सलीम शाहिद

तू ने ग़म ख़्वाह-मख़ाह उस का उठाया हुआ है

सलीम सरफ़राज़

तू दरिया है और ठहरने वाला मैं

सलीम मुहीउद्दीन

दश्त की धूप भर गया मुझ में

सलीम मुहीउद्दीन

फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में शाख़ से पत्ता निकाल दे

सलीम फ़िगार

नींद से पहले

सलीम अहमद

तिरे साँचे में ढलता जा रहा हूँ

सलीम अहमद

शगुफ़्ता बच्चों का चेहरा दिखाई देने लगे

सलाम मछली शहरी

वो घिर के आया घटाओं की तीरगी की तरह

सज्जाद बाक़र रिज़वी

इश्क़ तो सारी उम्र का इक पेशा निकला

सज्जाद बाक़र रिज़वी

दुनिया दुनिया सैर सफ़र थी शौक़ की राह तमाम हुई

सज्जाद बाक़र रिज़वी

ख़ला में घूर रहा है अजीब आदमी है

सज्जाद बलूच

देख पाई न मिरे साए में चलता साया

सज्जाद बलूच

लफ़्ज़ का कितना तक़द्दुस है ये कब जानते हैं

सज्जाद बाबर

नया रौशन सहीफ़ा दिख रहा नईं

साजिद हमीद

शिकस्ता-दिल थे तिरा ए'तिबार क्या करते

साजिद अमजद

चलो दुनिया से मिलना छोड़ देंगे

साजिद अमजद

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