रात Poetry (page 24)

दिन वस्ल के रंज-ए-शब-ए-ग़म भूल गए हैं

शैख़ मीर बख़्श मसरूर

वस्ल की शब में भी हम बाहम दिगर रोया किए

शैख़ करिमुद्दीन मुरादाबादी

अपने रोज़ ओ शब का आलम कर्बला से कम नहीं

शहज़ाद क़मर

जो कुछ भी मेरे पास थी दौलत निगल गई

शहज़ाद हुसैन साइल

वीरान तो नहीं शब-ए-तारीक की फ़ज़ा

शहज़ाद अहमद

शुमार मैं न करूँगा फ़िराक़ के शब ओ रोज़

शहज़ाद अहमद

रौशन भी करोगे कभी तारीकी-ए-शब को

शहज़ाद अहमद

सोता जागता साया

शहज़ाद अहमद

ये सोच कर कि तेरी जबीं पर न बल पड़े

शहज़ाद अहमद

वाक़िआ कोई न जन्नत में हुआ मेरे ब'अद

शहज़ाद अहमद

मेरी ख़ातिर देर न करना और सफ़र करते जाना

शहज़ाद अहमद

लगे थे ग़म तुझे किस उम्र में ज़माने के

शहज़ाद अहमद

खिले जो फूल तो मुँह छुप गया सितारों का

शहज़ाद अहमद

जो दिल में खटकती है कभी कह भी सकोगे

शहज़ाद अहमद

जान मुक़द्दर में थी जान से प्यारा न था

शहज़ाद अहमद

फ़स्ल-ए-गुल ख़ाक हुई जब तो सदा दी तू ने

शहज़ाद अहमद

दिल का बुरा नहीं मगर शख़्स अजीब ढब का है

शहज़ाद अहमद

बाग़ का बाग़ उजड़ गया कोई कहो पुकार कर

शहज़ाद अहमद

अस्ल में हूँ मैं मुजरिम मैं ने क्यूँ शिकायत की

शहज़ाद अहमद

आती है दम-ब-दम ये सदा जागते रहो

शहज़ाद अहमद

है कोई जो बताए शब के मुसाफ़िरों को

शहरयार

एक और मौत

शहरयार

चुपके से इधर आ जाओ

शहरयार

आख़िरी साँस

शहरयार

तेरे वा'दे को कभी झूट नहीं समझूँगा

शहरयार

शहर-ए-जुनूँ में कल तलक जो भी था सब बदल गया

शहरयार

निकला है चाँद शब की पज़ीराई के लिए

शहरयार

मंज़र गुज़िश्ता शब के दामन में भर रहा है

शहरयार

जहाँ मैं होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा

शहरयार

जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है

शहरयार

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