शाम Poetry (page 58)

कितनी सरकश भी हो सर-फिरी ये हवा रखना रौशन दिया

अमजद इस्लाम अमजद

कभी रक़्स-ए-शाम-ए-बहार में उसे देखते

अमजद इस्लाम अमजद

जगमगा उट्ठा है रंग मंच

अमित गुप्ता

सुब्ह होती है शाम होती है

अमीरुल्लाह तस्लीम

वस्ल में बिगड़े बने यार के अक्सर गेसू

अमीरुल्लाह तस्लीम

ज़मीं के जिस्म पे यूँ यूरिश-ए-क़ज़ा कब तक

आमिर नज़र

कुछ सुलगते हुए ख़्वाबों की फ़रावानी है

आमिर नज़र

खुला है तेरे बदन का भी इस्तिआरा कुछ

आमिर नज़र

दरून-ए-जिस्म की दीवार से उभरती है

आमिर नज़र

सुब्ह-ए-रौशन को अंधेरों से भरी शाम न दे

अमीता परसुराम 'मीता'

सुब्ह-ए-रौशन को अंधेरों से भरी शाम न दे

अमीता परसुराम 'मीता'

यार क्या ज़िंदगी है सूरज की

अमीर क़ज़लबाश

सुब्ह तक मैं सोचता हूँ शाम से

अमीर क़ज़लबाश

यकुम जनवरी है नया साल है

अमीर क़ज़लबाश

सुब्ह तक मैं सोचता हूँ शाम से

अमीर क़ज़लबाश

पाईं हर एक राह-गुज़र पर उदासियाँ

अमीर क़ज़लबाश

न पूछ मंज़र-ए-शाम-ओ-सहर पे क्या गुज़री

अमीर क़ज़लबाश

मिरे हाल पर मेहरबानी करे

अमीर क़ज़लबाश

हर रहगुज़र में काहकशाँ छोड़ जाऊँगा

अमीर क़ज़लबाश

अपने हमराह ख़ुद चला करना

अमीर क़ज़लबाश

आँखें खुली हुई हैं तो मंज़र भी आएगा

अमीर क़ज़लबाश

मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब

अमीर मीनाई

मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब

अमीर मीनाई

हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी

अमीर मीनाई

दिल जुदा माल जुदा जान जुदा लेते हैं

अमीर मीनाई

ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो

अमीर मीनाई

जो शाम होती है हर रोज़ हार जाता हूँ

अमीर इमाम

गुम-शुदा

अमीर इमाम

कि जैसे कोई मुसाफ़िर वतन में लौट आए

अमीर इमाम

कभी तो बनते हुए और कभी बिगड़ते हुए

अमीर इमाम

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