शाम Poetry (page 63)

वो रंग-ए-तमन्ना है कि सद-रंग हुआ हूँ

अख़्तर होशियारपुरी

उफ़ुक़ उफ़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं

अख़्तर होशियारपुरी

तिलिस्म-ए-गुम्बद-ए-बे-दर किसी पे वा न हुआ

अख़्तर होशियारपुरी

ख़्वाब-महल में कौन सर-ए-शाम आ कर पत्थर मारता है

अख़्तर होशियारपुरी

एक हम ही तो नहीं आबला-पा आवारा

अख़्तर होशियारपुरी

जाम ला जाम कि आलाम से जी डरता है

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

शबाब-ए-दर्द मिरी ज़िंदगी की सुब्ह सही

अख़्तर अंसारी

ये सनम रिवायत-ओ-नक़्ल के हुबल-ओ-मनात से कम नहीं

अख़्तर अंसारी

सरशार हूँ छलकते हुए जाम की क़सम

अख़्तर अंसारी

सदा कुछ ऐसी मिरे गोश-ए-दिल में आती है

अख़्तर अंसारी

जो दाग़ बन के तमन्ना तमाम हो जाए

अख़्तर अंसारी

में महफ़िल-ए-हयात में हैरान सा रहा

अख़लाक़ अहमद आहन

जला के दिल को रखा सुब्ह-ओ-शाम रोज़-ओ-शब

अख़लाक़ अहमद आहन

जुनून-ए-इश्क़ का जो कुछ हुआ अंजाम क्या कहिए

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

उस ख़ुश-अदा के आइना-ख़ाने में जाऊँगा

अकबर मासूम

ज़िंदान-ए-सुब्ह-ओ-शाम में तू भी है मैं भी हूँ

अकबर हैदराबादी

दहकते कुछ ख़याल हैं अजीब अजीब से

अकबर हैदराबादी

तमाम आलम-ए-इम्काँ मिरे गुमान में है

अकबर हमीदी

रात आई है बच्चों को पढ़ाने में लगा हूँ

अकबर हमीदी

रंग-ए-शराब से मिरी निय्यत बदल गई

अकबर इलाहाबादी

किया है मैं ने तआ'क़ुब वो सुब्ह-ओ-शाम अपना

अकबर अली खान अर्शी जादह

बस एक शाम का हर शाम इंतिज़ार रहा

अजमल सिराज

शाम अपनी बे-मज़ा जाती है रोज़

अजमल सिराज

किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है

अजमल सिराज

हम अपने-आप में रहते हैं दम में दम जैसे

अजमल सिराज

हर-सू जहाँ में शाम ओ सहर ढूँडते हैं हम

आजिज़ मातवी

ये किस लिए है तू इतना उदास दरवाज़े

अजीत सिंह हसरत

मुझ को प्रेम कहानी कर दो

अजीत सिंह हसरत

आख़िरी उम्मीद भी आँखों से छलकाए हुए

अजीत सिंह हसरत

वही हैं क़त्ल-ओ-ग़ारत और वही कोहराम है साक़ी

अजय सहाब

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