शाम Poetry (page 65)

आईना बन के अपना तमाशा दिखाएँ हम

अहमद शहरयार

जुनूँ की रस्म ज़माने में आम हो न सकी

अहमद शाहिद ख़ाँ

शबनम है कि धोका है कि झरना है कि तुम हो

अहमद सलमान

दियों से वा'दे वो कर रही थी अजीब रुत थी

अहमद सज्जाद बाबर

बुझती हुई आँखों का अकेला वो दिया था

अहमद सज्जाद बाबर

आता ही नहीं होने का यक़ीं क्या बात करूँ

अहमद रिज़वान

आँखें बनाता दश्त की वुसअत को देखता

अहमद रिज़वान

हम ही बदलेंगे रह-ओ-रस्म-ए-गुलिस्ताँ यारो

अहमद रियाज़

वक़्त की बात

अहमद राही

कभी तिरी कभी अपनी हयात का ग़म है

अहमद राही

कभी हयात का ग़म है कभी तिरा ग़म है

अहमद राही

गर्दिश-ए-जाम नहीं गर्दिश-ए-अय्याम तो है

अहमद राही

मुदावा हब्स का होने लगा आहिस्ता आहिस्ता

अहमद नदीम क़ासमी

ये वो मौसम है जिस में कोई पत्ता भी नहीं हिलता

अहमद मुश्ताक़

जब शाम उतरती है क्या दिल पे गुज़रती है

अहमद मुश्ताक़

होती है शाम आँख से आँसू रवाँ हुए

अहमद मुश्ताक़

ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं

अहमद मुश्ताक़

उजला तिरा बर्तन है और साफ़ तिरा पानी

अहमद मुश्ताक़

मुसलसल याद आती है चमक चश्म-ए-ग़ज़ालाँ की

अहमद मुश्ताक़

मुझे उस ने तिरी ख़बर दी है

अहमद मुश्ताक़

कभी ख़्वाहिश न हुई अंजुमन-आराई की

अहमद मुश्ताक़

हर लम्हा ज़ुल्मतों की ख़ुदाई का वक़्त है

अहमद मुश्ताक़

हमें सब अहल-ए-हवस ना-पसंद रखते हैं

अहमद मुश्ताक़

इक उम्र की और ज़रूरत है वही शाम-ओ-सहर करने के लिए

अहमद मुश्ताक़

दिलों की ओर धुआँ सा दिखाई देता है

अहमद मुश्ताक़

चमक-दमक पे न जाओ खरी नहीं कोई शय

अहमद मुश्ताक़

बहता आँसू एक झलक में कितने रूप दिखाएगा

अहमद मुश्ताक़

यूँ ही कब तक ऊपर ऊपर देखा जाए

अहमद महफ़ूज़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

सवाद-ए-शाम न रंग-ए-सहर को देखते हैं

अहमद महफ़ूज़

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