शाम Poetry (page 64)

तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो

ऐतबार साजिद

दिए मुंडेर प रख आते हैं हम हर शाम न जाने क्यूँ

ऐतबार साजिद

वो पहली जैसी वहशतें वो हाल ही नहीं रहा

ऐतबार साजिद

तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो

ऐतबार साजिद

तिलिस्म-ज़ार-ए-शब-ए-माह में गुज़र जाए

ऐतबार साजिद

तर्क-ए-तअल्लुक़ कर तो चुके हैं इक इम्कान अभी बाक़ी है

ऐतबार साजिद

रस्ते का इंतिख़ाब ज़रूरी सा हो गया

ऐतबार साजिद

कभी तू ने ख़ुद भी सोचा कि ये प्यास है तो क्यूँ है

ऐतबार साजिद

बंद दरीचे सूनी गलियाँ अन-देखे अनजाने लोग

ऐतबार साजिद

बहुत सजाए थे आँखों में ख़्वाब मैं ने भी

ऐतबार साजिद

जुरअत ऐ दिल मय ओ मीना है वो ख़ुद-काम भी है

ऐश देहलवी

मुझी में जीता है सूरज तमाम होने तक

ऐनुद्दीन आज़िम

इसी क़दर है हयात ओ अजल के बीच का फ़र्क़

ऐन ताबिश

हवेली मौत की दहलीज़ पर

ऐन ताबिश

हयात-ए-सोख़्ता-सामाँ इक इस्तिअा'रा-ए-शाम

ऐन ताबिश

आवारा भटकता रहा पैग़ाम किसी का

ऐन ताबिश

शहर

ऐन रशीद

मेरे बाद आ

ऐन रशीद

हाँ नहीं के बीच धुँदलाई सी शाम

अहसन यूसुफ़ ज़ई

नज़्ज़ारा जो होता है लब-ए-बाम तुम्हारा

अहसन मारहरवी

क्यूँ चुप हैं वो बे-बात समझ में नहीं आता

अहसन मारहरवी

ज़रुरत-ए-इत्तिहाद

अहमक़ फफूँदवी

ख़िदमत-ए-वतन

अहमक़ फफूँदवी

वो ख़्वाब सा पैकर है गुल-ए-तर की तरह है

अहमद ज़िया

एहसास की मंज़िल से गुज़र जाएगा आख़िर

अहमद ज़िया

म्यूजियम

अहमद ज़फ़र

और क्या मेरे लिए अरसा-ए-महशर होगा

अहमद ज़फ़र

ज़माना हो गया है ख़्वाब देखे

अहमद शनास

ज़माना हो गया है ख़्वाब देखे

अहमद शनास

कुछ शफ़क़ डूबते सूरज की बचा ली जाए

अहमद शनास

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