शौक Poetry (page 37)
जब वो मह-ए-रुख़्सार यकायक नज़र आया
दाऊद औरंगाबादी
दिल में ख़याल-ए-यार है जासूस की नमत
दाऊद औरंगाबादी
दिल कूँ दिलदार के नियाज़ करे
दाऊद औरंगाबादी
कोई दिल-लगी दिल लगाना नहीं है
दत्तात्रिया कैफ़ी
हुस्न-ए-अज़ल का जल्वा हमारी नज़र में है
दत्तात्रिया कैफ़ी
फ़िदा अल्लाह की ख़िल्क़त पे जिस का जिस्म ओ जाँ होगा
दत्तात्रिया कैफ़ी
इक ख़्वाब का ख़याल है दुनिया कहें जिसे
दत्तात्रिया कैफ़ी
इस राह में आते हैं बयाबाँ भी चमन भी
दर्शन सिंह
गुलों पे ख़ाक-ए-मेहन के सिवा कुछ और नहीं
दर्शन सिंह
चश्म-ए-बीना हो तो क़ैद-ए-हरम-ओ-तूर नहीं
दर्शन सिंह
क्या इज़्तिराब-ए-शौक़ ने मुझ को ख़जिल किया
दाग़ देहलवी
हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे
दाग़ देहलवी
सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी न करना
दाग़ देहलवी
साफ़ कब इम्तिहान लेते हैं
दाग़ देहलवी
सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
दाग़ देहलवी
पुकारती है ख़मोशी मिरी फ़ुग़ाँ की तरह
दाग़ देहलवी
निगाह-ए-शोख़ जब उस से लड़ी है
दाग़ देहलवी
मुझ सा न दे ज़माने को परवरदिगार दिल
दाग़ देहलवी
ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
दाग़ देहलवी
कौन सा ताइर-ए-गुम-गश्ता उसे याद आया
दाग़ देहलवी
जो हो सकता है उस से वो किसी से हो नहीं सकता
दाग़ देहलवी
जल्वे मिरी निगाह में कौन-ओ-मकाँ के हैं
दाग़ देहलवी
इधर देख लेना उधर देख लेना
दाग़ देहलवी
दिल परेशान हुआ जाता है
दाग़ देहलवी
दिल मुब्तला-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार ही रहा
दाग़ देहलवी
देख कर जौबन तिरा किस किस को हैरानी हुई
दाग़ देहलवी
भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं
दाग़ देहलवी
बाक़ी जहाँ में क़ैस न फ़रहाद रह गया
दाग़ देहलवी
अब वो ये कह रहे हैं मिरी मान जाइए
दाग़ देहलवी
इंसान नहीं वो जो गुनहगार नहीं हैं
डी. राज कँवल
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