केक Poetry (page 23)

फ़स्ल-ए-बहार जाने ये क्या गुल कतर गई

बेबाक भोजपुरी

तिरा कुश्ता उठाया अक़रबा ने

बयान यज़दानी

सर-ए-शोरीदा पा-ए-दश्त-ए-पैमा शाम-ए-हिज्राँ था

बयान मेरठी

खुला है जल्वा-ए-पिन्हाँ से अज़-बस चाक वहशत का

बयान मेरठी

दिल लगा लेते हैं अहल-ए-दिल वतन कोई भी हो

बासिर सुल्तान काज़मी

शहर-ए-फ़स्ल-ए-गुल से चल कर पत्थरों के दरमियाँ

बशीर फ़ारूक़ी

पिछली रात की नर्म चाँदनी शबनम की ख़ुनकी से रचा है

बशीर बद्र

रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे

बशर नवाज़

वहशत में भी रुख़ जानिब-ए-सहरा न करेंगे

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

मरहला दिल का न तस्ख़ीर हुआ

बाक़ी सिद्दीक़ी

क़लम सिफ़त में पस-अज़-मरातिब बदन सना में तिरी खपाया

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सैर में तेरी है बुलबुल बोस्ताँ बे-कार है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

हाँ मियाँ सच है तुम्हारी तो बला ही जाने

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

ग़ैरत-ए-गुल है तू और चाक-गरेबाँ हम हैं

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

चश्म-ए-तर जाम दिल-ए-बादा-कशाँ है शीशा

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

कितना भी मुस्कुराइए दिल है मगर बुझा बुझा

बनो ताहिरा सईद

हमें देखा न कर उड़ती नज़र से

बकुल देव

गो ज़रा तेज़ शुआएँ थीं ज़रा मंद थे हम

बकुल देव

चाल अपनी अदा से चलते हैं

बकुल देव

अहल-ए-ज़र ने देख कर कम-ज़रफ़ी-ए-अहल-ए-क़लम

बख़्श लाइलपूरी

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

बख़्श लाइलपूरी

दीदा-ए-बे-रंग में ख़ूँ-रंग मंज़र रख दिए

बख़्श लाइलपूरी

जो है याँ अासाइश-ए-रंज-ओ-मेहन में मस्त है

बहराम जी

ग़मगीं नहीं हूँ दहर में तो शाद भी नहीं

बहराम जी

सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद

ज़फ़र

क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला

ज़फ़र

ज़ेहन और दिल में जो रहती है चुभन खुल जाए

बद्र वास्ती

मुझ को नहीं मालूम कि वो कौन है क्या है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

उस आँख से वहशत की तासीर उठा लाया

अज़्म बहज़ाद

दिल सोया हुआ था मुद्दत से ये कैसी बशारत जागी है

अज़्म बहज़ाद

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