अलगाव Poetry (page 9)

ख़ुद ही मिल बैठे हो ये कैसी शनासाई हुई

शहज़ाद अहमद

ख़ल्क़ ने छीन ली मुझ से मिरी तन्हाई तक

शहज़ाद अहमद

हिज्र की रात मिरी जाँ पे बनी हो जैसे

शहज़ाद अहमद

डूब जाएँगे सितारे और बिखर जाएगी रात

शहज़ाद अहमद

अस्ल में हूँ मैं मुजरिम मैं ने क्यूँ शिकायत की

शहज़ाद अहमद

अब न वो शोर न वो शोर मचाने वाले

शहज़ाद अहमद

आप भी नहीं आए नींद भी नहीं आई

शहज़ाद अहमद

आज तक उस की मोहब्बत का नशा तारी है

शहज़ाद अहमद

तुझ से मिल कर भी न तन्हाई मिटेगी मेरी

शहरयार

है आज ये गिला कि अकेला है 'शहरयार'

शहरयार

उम्मीद ओ बीम

शहरयार

रात जुदाई की रात

शहरयार

उम्मीद से कम चश्म-ए-ख़रीदार में आए

शहरयार

तेरे वा'दे को कभी झूट नहीं समझूँगा

शहरयार

निकला है चाँद शब की पज़ीराई के लिए

शहरयार

जहाँ पे तेरी कमी भी न हो सके महसूस

शहरयार

जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है

शहरयार

जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है

शहरयार

हँस रहा था मैं बहुत गो वक़्त वो रोने का था

शहरयार

इनायत है तिरी बस एक एहसान और इतना कर

शहराम सर्मदी

हम-सफ़र ज़ीस्त का सूरज को बनाए रक्खा

शहनाज़ नूर

मिरे ख़ुदा कोई छाँव कोई ज़मीं कोई घर

शहनवाज़ ज़ैदी

इक हुजूम-ए-गिर्या की हर नज़र तमाशाई

शाहिदा तबस्सुम

सितारा-चश्म है और मेहरबाँ है

शाहिदा हसन

मैं अपने हिस्से की तन्हाई महफ़िल से निकालूँगा

शाहिद ज़की

हाशिए पर कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साना ख़्वाब का

शाहिद माहुली

कुंज-ए-दिल में है जो मलाल उछाल

शाहिद कमाल

कूचा-ए-संग-ए-मलामत के सब आसार के साथ

शाहिद कमाल

हवा की डोर में टूटे हुए तारे पिरोती है

शाहिद कमाल

भर गए ज़ख़्म तो क्या दर्द तो अब भी कोई है

शाहिद कमाल

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