वसल Poetry (page 18)

हर आरज़ू में रंग है बाग़-ओ-बहार का

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

फ़ित्ना-ए-रोज़गार की बातें

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

दिलकशी नाम को भी आलम-ए-इम्काँ में नहीं

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

देते हैं मेरे जाम में देखें शराब कब

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

दिल में है तलब और दुआ और तरह की

बुशरा एजाज़

इस क़दर बढ़ गई वहशत तिरे दीवाने की

बूम मेरठी

अल्लाह अल्लाह वस्ल की शब इस क़दर ए'जाज़ है

बूम मेरठी

अगर दुश्मन की थोड़ी सी मरम्मत और हो जाती

बूम मेरठी

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बैठे जो शाम से तिरे दर पे सहर हुई

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

सवाल-ए-वस्ल पर कुछ सोच कर उस ने कहा मुझ से

बेख़ुद देहलवी

दिल में फिर वस्ल के अरमान चले आते हैं

बेख़ुद देहलवी

दी क़सम वस्ल में उस बुत को ख़ुदा की तो कहा

बेख़ुद देहलवी

चलने की नहीं आज कोई घात किसी की

बेख़ुद देहलवी

बात करने की शब-ए-वस्ल इजाज़त दे दो

बेख़ुद देहलवी

पछताओगे फिर हम से शरारत नहीं अच्छी

बेख़ुद देहलवी

क्यूँ कह के दिल का हाल उसे बद-गुमाँ करूँ

बेख़ुद देहलवी

हुआ जो वक़्फ़-ए-ग़म वो दिल किसी का हो नहीं सकता

बेख़ुद देहलवी

दिल में फिर वस्ल के अरमान चले आते हैं

बेख़ुद देहलवी

दिल है मुश्ताक़ जुदा आँख तलबगार जुदा

बेख़ुद देहलवी

बेवफ़ा कहने से क्या वो बेवफ़ा हो जाएगा

बेख़ुद देहलवी

बात करने की शब-ए-वस्ल इजाज़त दे दो

बेख़ुद देहलवी

अदू के ताकने को तुम इधर देखो उधर देखो

बेख़ुद देहलवी

अब इस से क्या तुम्हें था या उमीद-वार न था

बेख़ुद देहलवी

आशिक़ समझ रहे हैं मुझे दिल लगी से आप

बेख़ुद देहलवी

आ गए फिर तिरे अरमान मिटाने हम को

बेख़ुद देहलवी

वो उन का वस्ल में ये कह के मुस्कुरा देना

बेखुद बदायुनी

हैं वस्ल में शोख़ी से पाबंद-ए-हया आँखें

बेखुद बदायुनी

कुछ बे-अदबी और शब-ए-वस्ल नहीं की

बेगम लखनवी

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