वसल Poetry (page 17)

शब-ए-वस्ल की क्या कहूँ दास्ताँ

दाग़ देहलवी

मुअज़्ज़िन ने शब-ए-वस्ल अज़ाँ पिछले पहर

दाग़ देहलवी

क्यूँ वस्ल की शब हाथ लगाने नहीं देते

दाग़ देहलवी

इस लिए वस्ल से इंकार है हम जान गए

दाग़ देहलवी

दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात

दाग़ देहलवी

उस के दर तक किसे रसाई है

दाग़ देहलवी

सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी न करना

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल ज़िद में बसर हो गई

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल भी लब पे आए गए हैं

दाग़ देहलवी

रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी

दाग़ देहलवी

क़रीने से अजब आरास्ता क़ातिल की महफ़िल है

दाग़ देहलवी

पुकारती है ख़मोशी मिरी फ़ुग़ाँ की तरह

दाग़ देहलवी

पयामी कामयाब आए न आए

दाग़ देहलवी

मुझ सा न दे ज़माने को परवरदिगार दिल

दाग़ देहलवी

मज़े इश्क़ के कुछ वही जानते हैं

दाग़ देहलवी

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा

दाग़ देहलवी

कौन सा ताइर-ए-गुम-गश्ता उसे याद आया

दाग़ देहलवी

होश आते ही हसीनों को क़यामत आई

दाग़ देहलवी

ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया

दाग़ देहलवी

ग़ैर को मुँह लगा के देख लिया

दाग़ देहलवी

दिल मुब्तला-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार ही रहा

दाग़ देहलवी

अभी हमारी मोहब्बत किसी को क्या मालूम

दाग़ देहलवी

अब वो ये कह रहे हैं मिरी मान जाइए

दाग़ देहलवी

उमीद-ए-वस्ल ने धोके दिए हैं इस क़दर 'हसरत'

चराग़ हसन हसरत

मोहब्बत किस क़दर यास-आफ़रीं मालूम होती है

चराग़ हसन हसरत

आओ हुस्न-ए-यार की बातें करें

चराग़ हसन हसरत

क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले

चरख़ चिन्योटी

क़रार खो के चले बे-क़रार हो के चले

चरख़ चिन्योटी

मचलेंगे उन के आने पे जज़्बात सैंकड़ों

चरख़ चिन्योटी

बे-ख़ुदी में है न वो पी कर सँभल जाने में है

चरख़ चिन्योटी

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