याद Poetry (page 19)

ख़ुशी याद आई न ग़म याद आए

सिकंदर अली वज्द

जिन की आँखों में था सुरूर-ए-ग़ज़ल

सिकंदर अली वज्द

तअ'ल्लुक़ की ना-जाएज़ तजावुज़ात

सिदरा सहर इमरान

वो सर्द धूप रेत समुंदर कहाँ गया

सिदरा सहर इमरान

बे-ख़याली में कहा था कि शनासाई नहीं

सिदरा सहर इमरान

भूली-बिसरी बात है लेकिन अब तक भूल न पाए हम

सिद्दीक़ मुजीबी

जो दिल की बारगाह में तजल्लियाँ दिखा गया

सिद्दीक़ा शबनम

ये रोज़ ओ शब का तसलसुल रवाँ-दवाँ ही रहा

सिद्दीक़ शाहिद

कुछ ऐसी टूट के शहर-ए-जुनूँ की याद आई

सिद्दीक़ शाहिद

दिल की बस्ती पे किसी दर्द का साया भी नहीं

सिद्दीक़ शाहिद

मल्बूस जब हवा ने बदन से चुरा लिए

सिब्त अली सबा

आँधी चली तो गर्द से हर चीज़ अट गई

सिब्त अली सबा

तिरी तस्वीर से रहमत बरसती है गुरु-नानक

श्याम सुंदर लाल बर्क़

नावक-ज़नी निगाह की ऐ जान-ए-जाँ है हेच

श्याम सुंदर लाल बर्क़

मसअले का हल न निकला देर तक

श्याम सुन्दर नंदा नूर

बेजा न था उठ बैठना बेचैनी से मेरा

शऊर बलगिरामी

ये मकीं क्या ये मकाँ सब ला-मकाँ का खेल है

शुजाअत इक़बाल

समझते क्या हैं इन दो चार रंगों को उधर वाले

शुजा ख़ावर

बहता है कोई ग़म का समुंदर मिरे अंदर

शोज़ेब काशिर

हिज्र ओ विसाल

शोरिश काश्मीरी

वो जिस के दिल में निहाँ दर्द दो-जहाँ का था

शोला हस्पानवी

उस ने फिर और क्या कहा होगा

शोला हस्पानवी

लबों पे अब कोई आह-ओ-फ़ुग़ाँ नहीं होती

शोला हस्पानवी

अपना ख़ालिक़ ख़ुद ही था मेरा ख़ुदा कोई न था

शोला हस्पानवी

ये किस अज़ाब में छोड़ा है तू ने इस दिल को

शोहरत बुख़ारी

कुछ ऐसा धुआँ है कि घुट्टी जाती हैं साँसें

शोहरत बुख़ारी

ज़िंदगी तुझ पे गिराँ है तू मरेगा कैसे

शोहरत बुख़ारी

इन को देखा था कहीं याद नहीं

शोहरत बुख़ारी

हम शहर में इक शम्अ की ख़ातिर हुए बर्बाद

शोहरत बुख़ारी

हर-चंद सहारा है तिरे प्यार का दिल को

शोहरत बुख़ारी

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