याद Poetry (page 21)
तंग थी जा ख़ातिर-ए-नाशाद में
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
कौन से दिन तिरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
कहूँ मैं क्या कि क्या दर्द-ए-निहाँ है
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
जब रक़ीबों का सितम याद आया
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
गोर में याद-ए-क़द-ए-यार ने सोने न दिया
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
याद और याद को भुलाने में
शीन काफ़ निज़ाम
गली के मोड़ से घर तक अँधेरा क्यूँ है 'निज़ाम'
शीन काफ़ निज़ाम
वही न मिलने का ग़म और वही गिला होगा
शीन काफ़ निज़ाम
पत्तियाँ हो गईं हरी देखो
शीन काफ़ निज़ाम
मौज-ए-हवा से फूलों के चेहरे उतर गए
शीन काफ़ निज़ाम
कभी जंगल कभी सहरा कभी दरिया लिख्खा
शीन काफ़ निज़ाम
अक्स ने आईने का घर छोड़ा
शीन काफ़ निज़ाम
आरज़ू थी एक दिन तुझ से मिलूँ
शीन काफ़ निज़ाम
दिल-ओ-निगाह के हुस्न-ओ-क़रार का मौसम
शाज़िया अकबर
दर-गुज़र
शाज़ तमकनत
आब ओ गिल
शाज़ तमकनत
सिमट सिमट सी गई थी ज़मीं किधर जाता
शाज़ तमकनत
सँभला नहीं दिल तुझ से बिछड़ कर कई दिन तक
शाज़ तमकनत
क्या क़यामत है कि इक शख़्स का हो भी न सकूँ
शाज़ तमकनत
क्या करूँ रंज गवारा न ख़ुशी रास मुझे
शाज़ तमकनत
किस किस को अब रोना होगा जाने क्या क्या भूल गया
शाज़ तमकनत
ख़्वार-ओ-रुसवा थे यहाँ अहल-ए-सुख़न पहले भी
शाज़ तमकनत
जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर
शाज़ तमकनत
छोड़ दूँ शहर तिरा छोड़ दूँ दुनिया तेरी
शाज़ तमकनत
ज़माना याद रक्खेगा तुम्हें ये काम कर जाना
शायान क़ुरैशी
ज़ख़्म सीने का फिर उभर आया
शायान क़ुरैशी
सब्र-ओ-क़रार टूट गया इज़्तिराब से
शायान क़ुरैशी
आ कर नजात बख़्श दो रंज-ओ-मलाल से
शौक़ सालकी
हसरत-ए-ज़ोहरा-वशाँ सर्व-क़दाँ है कि जो थी
शौक़ माहरी
देखते हैं जब कभी ईमान में नुक़सान शैख़
शौक़ बहराइची
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