याद Poetry (page 17)

हमारे जैसे ही लोगों से शहर भर गए हैं

सुहैल अख़्तर

उजड़े दिल-ओ-दिमाग़ को आबाद कर सकूँ

सुहैल अहमद ज़ैदी

नवाह-ए-जाँ में कहीं अबतरी सी लगती है

सुहैल अहमद ज़ैदी

मैं क्या करूँ कोई सब मेरे इख़्तियार में है

सुहैल अहमद ज़ैदी

मैं खो गया तो शहर-ए-फ़न में दस्तियाब हो गया

सुहैल अहमद ज़ैदी

ख़ैर उस से न सही ख़ुद से वफ़ा कर डालो

सुहैल अहमद ज़ैदी

जब शाम बढ़ी रात का चाक़ू निकल आया

सुहैल अहमद ज़ैदी

तिरी याद जो मेरे दिल में है बस उसी की जल्वागरी रही

सूफ़िया अनजुम ताज

रोज़ दोहराते थे अफ़्साना-ए-दिल

सूफ़ी तबस्सुम

जाने किस की थी ख़ता याद नहीं

सूफ़ी तबस्सुम

एक शोला सा उठा था दिल में

सूफ़ी तबस्सुम

इक फ़क़त याद है जाना उन का

सूफ़ी तबस्सुम

ये क्या कि इक जहाँ को करो वक़्फ़-ए-इज़्तिराब

सूफ़ी तबस्सुम

वफ़ा की आख़िरी मंज़िल भी आ रही है क़रीब

सूफ़ी तबस्सुम

उठी है जो क़दमों से वो दामन से अड़ी है

सूफ़ी तबस्सुम

तू ने कुछ भी न कहा हो जैसे

सूफ़ी तबस्सुम

तू ने कुछ भी न कहा हो जैसे

सूफ़ी तबस्सुम

सौ बार चमन महका सौ बार बहार आई

सूफ़ी तबस्सुम

कुछ और गुमरही-ए-दिल का राज़ क्या होगा

सूफ़ी तबस्सुम

किस ने ग़म के जाल बिखेरे

सूफ़ी तबस्सुम

जब अश्क तिरी याद में आँखों से ढले हैं

सूफ़ी तबस्सुम

जाने किस की थी ख़ता याद नहीं

सूफ़ी तबस्सुम

हर एक नक़्श तिरे पाँव का निशाँ सा है

सूफ़ी तबस्सुम

ग़म-नसीबों को किसी ने तो पुकारा होगा

सूफ़ी तबस्सुम

दिल को आए कि निगाहों को यक़ीं आ जाए

सूफ़ी तबस्सुम

दास्तान-ए-ग़म हम ने कह भी दी तो क्या होगा

सूफ़ी तबस्सुम

बुझी बुझी सी सितारों की रौशनी है अभी

सूफ़ी तबस्सुम

अफ़्साना-हा-ए-दर्द सुनाते चले गए

सूफ़ी तबस्सुम

आँखें खुली थीं सब की कोई देखता न था

सूफ़ी तबस्सुम

ये जो काली घटा छाई हुई है

सुदर्शन कुमार वुग्गल

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