याद Poetry (page 38)

मोजज़ा कोई दिखाऊँ भी तो क्या

रूही कंजाही

इस शोला-ख़ू की तरह बिगड़ता नहीं कोई

रूही कंजाही

और अभी तेज़ दौड़ना है मुझे

रूही कंजाही

तिलिस्म-ए-नश्शा-ए-दुनिया भी आज ख़त्म हुआ

रोहित सोनी ‘ताबिश’

ज़बान पे नाला-ओ-फ़रियाद के सिवा क्या है

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

तुम्हारी याद तुम्हारा ख़याल काफ़ी है

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

मय-ख़ाने में क्यूँ याद-ए-ख़ुदा होती है अक्सर

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सीधे जो अब ज़ुल्फ़ों वाले हुए हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

ये कोई बात है सुनता न बाग़बाँ मेरी

रियाज़ ख़ैराबादी

सितम-ए-ना-रवा को रोते हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

रूठे हुए कि अपने ज़रा अब मनाए ज़ुल्फ़

रियाज़ ख़ैराबादी

मुझ को न दिल पसंद न दिल की ये ख़ू पसंद

रियाज़ ख़ैराबादी

मर कर अरे वाइज़ कोई ज़िंदा नहीं होता

रियाज़ ख़ैराबादी

किसी से वस्ल में सुनते ही जान सूख गई

रियाज़ ख़ैराबादी

काफ़िर बुतों के नाम हों क्यूँकर तमाम हिफ़्ज़

रियाज़ ख़ैराबादी

इश्क़ में दिल-लगी सी रहती है

रियाज़ ख़ैराबादी

हम भी पिएँ तुम्हें भी पिलाएँ तमाम रात

रियाज़ ख़ैराबादी

हो के बेताब बदल लेते थे अक्सर करवट

रियाज़ ख़ैराबादी

आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया

रियाज़ ख़ैराबादी

सर-ए-राह इक हादिसा हो गया

ऋषि पटियालवी

उदास उदास थे हम उस को इक ज़माना हुआ

रिन्द साग़री

सबा गुलों की हर इक पंखुड़ी सँवारती है

रिन्द साग़री

ज़ुल्फ़ें छोड़ीं हैं कि जोड़ा उस ने छोड़ा साँप का

रिन्द लखनवी

न अंगिया न कुर्ती है जानी तुम्हारी

रिन्द लखनवी

इक परी का फिर मुझे शैदा किया

रिन्द लखनवी

दिल-लगी ग़ैरों से बे-जा है मिरी जाँ छोड़ दे

रिन्द लखनवी

छुप के घर ग़ैर के जाया न करो

रिन्द लखनवी

ग़म-ए-हयात से इतनी भी है कहाँ फ़ुर्सत

रिफ़अत सुलतान

मसर्रतों का खिला है हर एक सम्त चमन

रिफ़अत सुलतान

बहारों को चमन याद आ गया है

रिफ़अत सुलतान

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