अंदर Poetry (page 27)

फ़िक्र में हैं हमें बुझाने की

अज़हर इनायती

तस्बीह-ए-कुमरी सर्व-ए-सनोबर समेट लो

अज़हर हाश्मी

आज़ुर्दा निगाहों पे ये मंज़र नहीं उतरा

अज़हर हाश्मी

कमी है कौन सी घर में दिखाने लग गए हैं

अज़हर फ़राग़

दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था

अज़हर फ़राग़

कभी उस से दुआ की खेतियाँ सैराब करना

अज़हर अदीब

अपना जैसा भी हाल रक्खा है

अज़हर अदीब

ये मैं था या मिरे अंदर का ख़ौफ़ था जिस ने

आज़ाद गुलाटी

अपनी सारी काविशों को राएगाँ मैं ने किया

आज़ाद गुलाटी

वो जो किसी का रूप धार कर आया था

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

फिर इस के बा'द का कोई न हो गुज़र मुझ में

आज़ाद गुलाटी

मैं बिछड़ कर तुझ से तेरी रूह के पैकर में हूँ

आज़ाद गुलाटी

लम्हा लम्हा इक नई सई-ए-बक़ा करती हुई

आज़ाद गुलाटी

कभी मिली जो तिरे दर्द की नवा मुझ को

आज़ाद गुलाटी

हमारी आँख में ठहरा हुआ समुंदर था

आज़ाद गुलाटी

अपनी सारी काविशों को राएगाँ मैं ने किया

आज़ाद गुलाटी

आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए

आज़ाद गुलाटी

मता-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र रहा हूँ

अय्यूब साबिर

मोहब्बत का एक साल

अय्यूब ख़ावर

कोई न देखे गूँज हवा की

अय्यूब ख़ावर

आम रस्ते से हट के आया हूँ

औरंगज़ेब

आइने से गुज़रने वाला था

औरंगज़ेब

किस के पैरों के नक़्श हैं मुझ में

अतीक़ुल्लाह

हर मंज़र के अंदर भी इक मंज़र है

अतीक़ुल्लाह

कितना मुश्किल है

अतीक़ुल्लाह

हमारे मा-बैन

अतीक़ुल्लाह

वो जो सर्फ़-ए-निगाह करता है

अतीक़ुल्लाह

दे कर पिछली यादों का अम्बार मुझे

अतीक़ुल्लाह

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