अंदर Poetry (page 26)

दिल-ख़स्तगाँ में दर्द का आज़र कोई तो आए

अज़ीज़ क़ैसी

चश्म-ए-साक़ी का तसव्वुर बज़्म में काम आ गया

अज़ीज़ लखनवी

उस ने चाहा था कि छुप जाए वो अपने अंदर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मिरे अंदर से यूँ फेंकी किसी ने रौशनी मुझ पर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरे अंदर कोई तकता रहा रस्ता उस का

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरे अंदर एक दस्तक सी कहीं होती रही

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मिरे अंदर ढंडोरा पीटता है कोई रह रह के

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मैं फूट फूट के रोई मगर मिरे अंदर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

बुझा के रख गया है कौन मुझ को ताक़-ए-निस्याँ पर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़रा मुश्किल से समझेंगे हमारे तर्जुमाँ हम को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

रूठ जाएगा तो मुझ से और क्या ले जाएगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

फूँक देंगे मिरे अंदर के उजाले मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

पड़ा है ज़िंदगी के इस सफ़र से साबिक़ा अपना

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

निकलना ख़ुद से मुमकिन है न मुमकिन वापसी मेरी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

न जाने कब से बराबर मिरी तलाश में है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरे अंदर एक दस्तक सी कहीं होती रही

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरा भी हर अंग था बहरा उस का जिस्म भी गूँगा था

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

कभी गोकुल कभी राधा कभी मोहन बन के

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अलावा इक चुभन के क्या है ख़ुद से राब्ता मेरा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

आप भी रेत का मल्बूस पहन कर देखें

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

जो मेरा झूट है अक्सर मिरे अंदर निकलता है

अज़हर नवाज़

उतर कर पानियों में चाँद महव-ए-रक़्स रहता है

अज़हर नक़वी

दिल ख़ाक हुआ प्यार की इस आग में जल कर

अज़हर नैयर

मिरी दुनिया अकेली हो रही है

अज़हर नैयर

मुझ को वहशत हुई मिरे घर से

अज़हर इक़बाल

वो तड़प जाए इशारा कोई ऐसा देना

अज़हर इनायती

जाने आया था क्यूँ मकान से मैं

अज़हर इनायती

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