मूर्ति Poetry (page 20)

बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

उसे इक बुत के आगे सर झुकाते सब ने देखा है

भारत भूषण पन्त

दश्त में उड़ते बगूलों की ये मस्ती एक दिन

भारत भूषण पन्त

पढ़े जाओ 'बेख़ुद' ग़ज़ल पर ग़ज़ल

बेख़ुद देहलवी

दी क़सम वस्ल में उस बुत को ख़ुदा की तो कहा

बेख़ुद देहलवी

बनी थी दिल पे कुछ ऐसी की इज़्तिराब न था

बेख़ुद देहलवी

शिकवा सुन कर जो मिज़ाज-ए-बुत-ए-बद-ख़ू बदला

बेखुद बदायुनी

उन को दिमाग़-ए-पुर्सिश-ए-अहल-ए-मेहन कहाँ

बेखुद बदायुनी

शिकवा सुन कर जो मिज़ाज-ए-बुत-ए-बद-ख़ू बदला

बेखुद बदायुनी

हम चटानों की तरह साहिल पे ढाले जाएँगे

बेकल उत्साही

उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं

बहज़ाद लखनवी

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे

बहज़ाद लखनवी

अपना तो ये मज़हब है काबा हो कि बुत-ख़ाना

बेदम शाह वारसी

उस को दुनिया और न उक़्बा चाहिए

बेदम शाह वारसी

तूर वाले तिरी तनवीर लिए बैठे हैं

बेदम शाह वारसी

न सुनो मेरे नाले हैं दर्द-भरे दार-ओ-असरे आह-ए-सहरे

बेदम शाह वारसी

न मेहराब-ए-हरम समझे न जाने ताक़-ए-बुत-ख़ाना

बेदम शाह वारसी

कौन सा घर है कि ऐ जाँ नहीं काशाना तिरा और जल्वा-ख़ाना तिरा

बेदम शाह वारसी

बुत भी इस में रहते थे दिल यार का भी काशाना था

बेदम शाह वारसी

अगर काबा का रुख़ भी जानिब-ए-मय-ख़ाना हो जाए

बेदम शाह वारसी

हिकमत का बुत-ख़ाना

बेबाक भोजपुरी

हक़-केश की फ़रियाद

बेबाक भोजपुरी

ग़म-ए-आफ़ाक़ में आरिफ़ अगर करवट बदलता है

बेबाक भोजपुरी

शैख़ के माथे पे मिट्टी बरहमन के बर में बुत

बयान मेरठी

नहीं ये आदमी का काम वाइ'ज़

बयान मेरठी

ये मैं कहूँगा फ़लक पे जा कर ज़मीं से आया हूँ तंग आ कर

बयान मेरठी

खुला है जल्वा-ए-पिन्हाँ से अज़-बस चाक वहशत का

बयान मेरठी

ख़ाक करती है ब-रंग-ए-चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम रक़्स

बयान मेरठी

बदलने रंग सिखलाए जहाँ को

बयान मेरठी

कोई किसी का कहीं आश्ना नहीं देखा

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

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