दर Poetry (page 31)

हर्फ़-ए-बे-मतलब की मैं ने किस क़दर तफ़्सीर की

सलीम शाहिद

फ़र्श-ए-ज़मीं पे बर्ग-ए-ख़िज़ानी का रंग है

सलीम शाहिद

मैं जानता हूँ मकीनों की ख़ामुशी का सबब

सलीम कौसर

अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं

सलीम कौसर

साल की आख़िरी शब

सलीम कौसर

ये लोग जिस से अब इंकार करना चाहते हैं

सलीम कौसर

वुसअत है वही तंगी-अफ़्लाक वही है

सलीम कौसर

सफ़र की इब्तिदा हुई कि तेरा ध्यान आ गया

सलीम कौसर

क्या बताएँ फ़स्ल-ए-बे-ख़्वाबी यहाँ बोता है कौन

सलीम कौसर

डूबने वाले भी तन्हा थे तन्हा देखने वाले थे

सलीम कौसर

चश्म बे-ख़्वाब हुई शहर की वीरानी से

सलीम कौसर

चराग़-ए-याद की लौ हम-सफ़र कहाँ तक है

सलीम कौसर

अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं

सलीम कौसर

अभी जो गर्दिश-ए-अय्याम से मिला हूँ मैं

सलीम कौसर

शाख़-दर-शाख़ तिरी याद की हरियाली है

सलीम फ़िगार

खो दिए हैं चाँद कितने इक सितारा माँग कर

सलीम फ़िगार

दीद के बदले सदा दीदा-ए-तर रक्खा है

सलीम फ़िगार

दीद के बदले सदा दीदा-ए-तर रक्खा है

सलीम फ़िगार

वो तीरगी-ए-शब है कि घर लौट गए हैं

सलीम फ़राज़

क्या लुत्फ़ हवाओं के सफ़र में नहीं रक्खा

सलीम फ़राज़

किस ने कहा कि मुझ को ये दुनिया नहीं पसंद

सलीम फ़राज़

देख माज़ी के दरीचों को कभी खोला न कर

सलीम फ़राज़

सहराओं में जा पहुँची है शहरों से निकल कर

सलीम बेताब

पड़ा हुआ मैं किसी आइने के घर में हूँ

सलीम बेताब

दश्त ओ दर ख़ैर मनाएँ कि अभी वहशत में

सलीम अहमद

दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ

सलीम अहमद

नींद से पहले

सलीम अहमद

नया मकान

सलीम अहमद

उम्र भर काविश-ए-इज़हार ने सोने न दिया

सलीम अहमद

मिला जो काम ग़म-ए-मो'तबर बनाने का

सलीम अहमद

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