दर Poetry (page 32)

जिस का इंकार भी इंकार न समझा जाए

सलीम अहमद

इश्क़ में जिस के ये अहवाल बना रक्खा है

सलीम अहमद

देखने के लिए इक शर्त है मंज़र होना

सलीम अहमद

बन के दुनिया का तमाशा मो'तबर हो जाएँगे

सलीम अहमद

आँखों में सितारे से चमकते रहे ता-देर

सलीम अहमद

ऐ मिरे घर की फ़ज़ाओं से गुरेज़ाँ महताब

सलाम मछली शहरी

गुरेज़

सलाम मछली शहरी

इन ग़ज़ालान-ए-तरह-दार को कैसे छोड़ूँ

सलाम मछली शहरी

'सख़ी' बैठिए हट के कुछ उस के दर से

सख़ी लख़नवी

रौशनी दर पे खड़ी मुझ को बुलाती क्यूँ है

शख़ावत शमीम

आरज़ूओं का हसीं पैकर तराश

सज्जाद सय्यद

ये कैसा हादसा गुज़रा ये कैसा सानेहा बीता

सज्जाद शम्सी

दुआओं में असर बाक़ी न आहों में असर बाक़ी

सज्जाद शम्सी

दीवार क़हक़हा

सज्जाद बाक़र रिज़वी

ज़ख़्म खुले पड़ते हैं दिल के मौसम है ये बहारों का

सज्जाद बाक़र रिज़वी

शो'ला सा कोई बर्क़-ए-नज़र से नहीं उठता

सज्जाद बाक़र रिज़वी

कम-ज़र्फ़ भी है पी के बहकता भी बहुत है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

जहाँ में रह के भी हम कब जहाँ में रहते हैं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

इस दिल को क्या कहें कि जिधर था उधर न था

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हमें चार सम्त की दौड़ में वही गर्द-ए-बाद-ए-सदा मिला

सज्जाद बाक़र रिज़वी

घिरते बादल में तन्हाई कैसी लगती है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

चाहत जी का रोग है प्यारे जी को रोक लगाओ क्यूँ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

बे-दिली वो है कि मरने की तमन्ना भी नहीं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

सुर्ख़ मकाँ ढलता जाता है इक बर्फ़ीली मिट्टी में

सज्जाद बलूच

शब की ज़ुल्फ़ें सँवारता हुआ मैं

सज्जाद बलूच

इक हवा उट्ठेगी सारे बाल-ओ-पर ले जाएगी

सज्जाद बाबर

वो पल ये घड़ी

साजिदा ज़ैदी

कब से महव-ए-सफ़र हो

साजिदा ज़ैदी

किश्त-ए-वीराँ की तरह तिश्ना रही रात मिरी

साजिदा ज़ैदी

चलो दुनिया से मिलना छोड़ देंगे

साजिद अमजद

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