दर Poetry (page 33)

कोई इम्काँ तो न था उस का मगर चाहता था

साइमा असमा

ज़ोहद किस किस ने लुटाए हैं तुम्हें क्या मालूम

सैफ़ुद्दीन सैफ़

कितना बेकार तमन्ना का सफ़र होता है

सैफ़ुद्दीन सैफ़

ऐसा नहीं हम से कभी लग़्ज़िश नहीं होती

सैफ़ी सरौंजी

ख़्वाहिश से कहीं कोई माहौल बदलता है

सैफ़ी प्रेमी

यादों की गूँज ज़ेहन से बाहर निकालिए

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

साए जो संग-ए-राह थे रस्ते से हट गए

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

क्यूँ जल-बुझे कहीं तो गिरफ़्तार बोलते

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

इतने दुखी हैं हम को मसर्रत भी ग़म बने

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

वो पर्दा ज़ीनत-ए-दर के सिवा कुछ और नहीं

सैफ़ बिजनोरी

वो सुब्ह कभी तो आएगी

साहिर लुधियानवी

तुलू-ए-इश्तिराकियत

साहिर लुधियानवी

ताज-महल

साहिर लुधियानवी

सुब्ह-ए-नौ-रूज़

साहिर लुधियानवी

नया सफ़र है पुराने चराग़ गुल कर दो

साहिर लुधियानवी

ख़ुद-कुशी से पहले

साहिर लुधियानवी

गुरेज़

साहिर लुधियानवी

एहसास-ए-कामराँ

साहिर लुधियानवी

ऐ नई नस्ल

साहिर लुधियानवी

आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है

साहिर लुधियानवी

आज

साहिर लुधियानवी

ये ज़मीं किस क़दर सजाई गई

साहिर लुधियानवी

हम गदा-ए-दर-ए-मय-ख़ाना हैं ऐ पीर-ए-मुग़ाँ

साहिर देहल्वी

कैफ़-ए-मस्ती में अजब जलवा-ए-यकताई था

साहिर देहल्वी

दैर-ओ-हरम हैं मंज़र-ए-आईन-ए-इख़तिलाफ़

साहिर देहल्वी

ख़ुद को ख़ुद में तहलील करो

साहिल अहमद

थपकियाँ दे के तिरे ग़म को सुलाया हम ने

साहिबा शहरयार

सुख़न को तूल न दे अपनी एहतियाज बता

सहबा वहीद

एक मैं हूँ एक तू है बा-ख़बर कोई नहीं

सहबा वहीद

एक मैं हूँ एक तू है बा-ख़बर कोई नहीं

सहबा वहीद

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