दर Poetry (page 35)

यूँ तो हर एक शख़्स ही तालिब समर का है

सादिक़ नसीम

रश्क-ए-महताब जहाँ-ताब था हर क़र्या-ए-जाँ

सादिक़ नसीम

ज़िंदगी ग़म के अंधेरों में सँवरने से रही

सादिक़ इंदौरी

एक इक लम्हा मुझे ज़ीस्त से बे-ज़ारी है

सादिक़ इंदौरी

एक पुरानी नज़्म

सादिक़

एक बार फिर

सादिक़

वो चीर के आकाश ज़मीं पर उतर आया

सादिक़

फिर से लहू लहू दर-ओ-दीवार देख ले

सादिक़

कुछ बे-ठिकाना करती रहीं हिजरतें मुदाम

साबिर ज़फ़र

तन्हाई तामीर करेगी घर से बेहतर इक ज़िंदान

साबिर ज़फ़र

में सोचता हूँ जिसे आश्ना भी होता है

साबिर ज़फ़र

महसूस लम्स जिस का सर-ए-रह-गुज़र किया

साबिर ज़फ़र

हर एक मरहला-ए-दर्द से गुज़र भी गया

साबिर ज़फ़र

हो कोई मसअला अपना दुआ पर छोड़ देते हैं

साबिर रज़ा

अजनबी

साबिर दत्त

कैसी मअनी की क़बा रिश्तों को पहनाई गई

साबिर अदीब

दिल में आ जा दिलबर साईं

सबीहा सबा, पाकिस्तान

बे-ख़याली में तख़्लीक़

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

हम ने ख़ाक-ए-दर-ए-महबूब जो चेहरे पे मली

सबा जायसी

ज़िंदगानी हँस के तय अपना सफ़र कर जाएगी

सबा इकराम

इन पत्थरों के शहर में दिल का गुज़र कहाँ

सबा इकराम

अज़ल से आज तक सज्दे किए और ये नहीं सोचा

सबा अकबराबादी

अच्छा हुआ कि सब दर-ओ-दीवार गिर पड़े

सबा अकबराबादी

उस को भी हम से मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं

सबा अकबराबादी

सोना था जितना अहद-ए-जवानी में सो लिए

सबा अकबराबादी

कसरत-ए-जल्वा को आईना-ए-वहदत समझो

सबा अकबराबादी

इस रंग में अपने दिल-ए-नादाँ से गिला है

सबा अकबराबादी

है जो दरवेश वो सुल्ताँ है ये मा'लूम हुआ

सबा अकबराबादी

आईना बन जाइए जल्वा-असर हो जाइए

सबा अकबराबादी

कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं

सबा अफ़ग़ानी

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