दर Poetry (page 37)

दर्द हो तो दवा करे कोई

रियाज़ ख़ैराबादी

अक्स पर यूँ आँख डाली जाएगी

रियाज़ ख़ैराबादी

लाएगी गर्दिश में तुझ को भी मिरी आवारगी

रिन्द लखनवी

ख़ाक छनवाती है दीवानों से अपने मुद्दतों

रिन्द लखनवी

साइलाना उन के दर पर जब मिरा जाना हुआ

रिन्द लखनवी

गले लगाएँ बलाएँ लें तुम को प्यार करें

रिन्द लखनवी

दिल किस से लगाऊँ कहीं दिलबर नहीं मिलता

रिन्द लखनवी

रहा असीर कई साल नक़्श-ए-पा की तरह

रिफ़अत सुलतान

नक़ाब-ए-रुख़ उठा कर हुस्न जब जल्वा-फ़िगन होगा

रिफ़अत सेठी

शहर-ए-शोर-ओ-शर तन्हा घर के बाम-ओ-दर तन्हा

रिफ़अत सरोश

हंगामे से वहशत होती है तन्हाई में जी घबराए है

रिफ़अत सरोश

गली गली मिरी वहशत लिए फिरे है मुझे

रिफ़अत सरोश

दौलत-ए-हर्फ़-ओ-बयाँ साथ लिए फिरते हैं

रिफ़अत सरोश

रात दिन महबूस अपने ज़ाहिरी पैकर में हूँ

रियाज़ मजीद

निशान क़ाफ़ला-दर-क़ाफ़ला रहेगा मिरा

रियाज़ मजीद

मैं कार-आमद हूँ या बे-कार हूँ मैं

रहमान फ़ारिस

क्यूँ तिरे साथ रहीं उम्र बसर होने तक

रहमान फ़ारिस

ख़ाक उड़ती है रात-भर मुझ में

रहमान फ़ारिस

हमारे अज़ाबों का क्या पूछते हैं

रज़्ज़ाक़ अरशद

दिल के दर्द के कम होने का तन्हा कुछ सामान हुआ

रज़िया फ़सीह अहमद

मैं हूँ मेरी चश्म-ए-तर है रात है तंहाई है

राज़िक़ अंसारी

दहका पड़ा है जामा-ए-गुल यार ख़ैर हो

रज़ी रज़ीउद्दीन

सलामत आए हैं फिर उस के कूचा-ओ-दर से

राज़ी अख्तर शौक़

जिस पल मैं ने घर की इमारत ख़्वाब-आसार बनाई थी

राज़ी अख्तर शौक़

दिन का मलाल शाम की वहशत कहाँ से लाएँ

राज़ी अख्तर शौक़

रैलियाँ ही रैलियाँ

रज़ा नक़वी वाही

मेहमान-ए-ख़ोसूसी

रज़ा नक़वी वाही

जो ख़ुद न अपने इरादे से बद-गुमाँ होता

रज़ा लखनवी

फिर राह दिखा मुझ को ऐ मशरब-ए-रिंदाना

रज़ा जौनपुरी

दिल को मामूर करो जज़्ब-ओ-असर से पहले

रज़ा जौनपुरी

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