दर Poetry (page 42)

छतों पे आग रही बाम-ओ-दर पे धूप रही

इक़बाल उमर

ज़िंदाँ-नसीब हूँ मिरे क़ाबू में सर नहीं

इक़बाल सुहैल

ज़बानों पर नहीं अब तूर का फ़साना बरसों से

इक़बाल सुहैल

जो तसव्वुर से मावरा न हुआ

इक़बाल सुहैल

असीरों में भी हो जाएँ जो कुछ आशुफ़्ता-सर पैदा

इक़बाल सुहैल

अब दिल को हम ने बंदा-ए-जानाँ बना दिया

इक़बाल सुहैल

मैं तिरे दर का भिकारी तू मिरे दर का फ़क़ीर

इक़बाल साजिद

सरसब्ज़ दिल की कोई भी ख़्वाहिश नहीं हुई

इक़बाल साजिद

संग-दिल हूँ इस क़दर आँखें भिगो सकता नहीं

इक़बाल साजिद

ख़ौफ़ दिल में न तिरे दर के गदा ने रक्खा

इक़बाल साजिद

जाने क्यूँ घर में मिरे दश्त-ओ-बयाबाँ छोड़ कर

इक़बाल साजिद

ग़ार से संग हटाया तो वो ख़ाली निकला

इक़बाल साजिद

दहर के अंधे कुएँ में कस के आवाज़ा लगा

इक़बाल साजिद

अब इतनी ज़ोर से हर घर पे दस्तकें देना

इक़बाल नवेद

ज़मीं मदार से अपने अगर निकल जाए

इक़बाल नवेद

साल नौ के लिए एक नज़्म

इक़बाल नाज़िर

बगूलों की सफ़ें किरनों के लश्कर सामने आए

इक़बाल माहिर

ख़्वाब बर्फ़ानी चिता है

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

रवाँ हूँ मैं

इक़बाल कौसर

मैं दर पे तिरे दर-ब-दरी से निकल आया

इक़बाल कौसर

खोए गए तो आइने को मो'तबर किया

इक़बाल हैदर

जो तेरे दर्द हैं वही सब मेरे दर्द हैं

इक़बाल हैदर

कुछ ऐसे ज़ख़्म भी दर-पर्दा हम ने खाए हैं

इक़बाल अज़ीम

सब समझते हैं कि हम किस कारवाँ के लोग हैं

इक़बाल अज़ीम

कुछ ऐसे ज़ख़्म भी दर-पर्दा हम ने खाए हैं

इक़बाल अज़ीम

बिल-एहतिमाम ज़ुल्म की तज्दीद की गई

इक़बाल अज़ीम

कौन सा ग़म है मिरे दिल में जो मेहमान नहीं

इन्तेसार हुसैन आबिदी शाहिद

तुझ से यूँ यक-बार तोड़ूँ किस तरह

इंशा अल्लाह ख़ान

नींद मस्तों को कहाँ और किधर का तकिया

इंशा अल्लाह ख़ान

मुझे छेड़ने को साक़ी ने दिया जो जाम उल्टा

इंशा अल्लाह ख़ान

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