दर Poetry (page 40)
चराग़-ए-सुब्ह से शाम-ए-वतन की बात करो
रसा चुग़ताई
परिंदे होते अगर हम हमारे पर होते
रऊफ़ अमीर
झुलसती धूप में ठंडी हवा का झोंका भेज
रऊफ़ अमीर
इस उजड़े शहर के आसार तक नहीं पहुँचे
रऊफ़ अमीर
यक़ीनन है कोई माह-ए-मुनव्वर पीछे चिलमन के
रंजूर अज़ीमाबादी
सौदा-ए-सज्दा शाम-ओ-सहर मेरे सर में है
रंजूर अज़ीमाबादी
सब की आँखें तो खुली हैं देखता कोई नहीं
राणा गन्नौरी
ज़रा ज़रा सी बात पर वो मुझ से बद-गुमाँ रहे
रमेश कँवल
अपनों के दरमियान सलामत नहीं रहे
रमेश कँवल
फिर भीग चलीं आँखें चलने लगी पुर्वाई
राम कृष्ण मुज़्तर
तमाम रास्ता फूलों भरा है मेरे लिए
राजेन्द्र मनचंदा बानी
कोई भूली हुई शय ताक़-ए-हर-मंज़र पे रक्खी थी
राजेन्द्र मनचंदा बानी
हम हैं मंज़र सियह आसमानों का है
राजेन्द्र मनचंदा बानी
इक ढेर राख में से शरर चुन रहा हूँ मैं
राजेन्द्र मनचंदा बानी
चाँद की अव्वल किरन मंज़र-ब-मंज़र आएगी
राजेन्द्र मनचंदा बानी
अक्स कोई किसी मंज़र में न था
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ऐ लम्हो मैं क्यूँ लम्हा-ए-लर्ज़ां हूँ बताओ
राजेन्द्र मनचंदा बानी
किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो
राजेन्द्र कृष्ण
यूँ देखिए तो आँधी में बस इक शजर गया
राजेश रेड्डी
सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया
राजेश रेड्डी
जिस को भी देखो तिरे दर का पता पूछता है
राजेश रेड्डी
क़ुरआँ किताब है रुख़-ए-जानाँ के सामने
रजब अली बेग सुरूर
क़स्र-ए-वीराँ
राजा मेहदी अली ख़ाँ
मियाँ के दोस्त
राजा मेहदी अली ख़ाँ
जमाल-ज़ादा
राजा मेहदी अली ख़ाँ
चार बजे
राजा मेहदी अली ख़ाँ
मआल
राज नारायण राज़
सोचिए गर्मी-ए-गुफ़्तार कहाँ से आई
राज नारायण राज़
क्या बात है कि बात ही दिल की अदा न हो
राज नारायण राज़
बूँदें पड़ी थीं छत पे कि सब लोग उठ गए
राज नारायण राज़
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