दर Poetry (page 41)

अशआर रंग रूप से महरूम क्या हुए

राज नारायण राज़

ज़ौक़-ए-सुजूद ले गया मुझ को कहाँ कहाँ

राज कुमार सूरी नदीम

फिर उन की निगाहों के पयाम आए हुए हैं

राज कुमार सूरी नदीम

हम गर्दिश-ए-दौराँ के सितम देख रहे हैं

राज कुमार सूरी नदीम

फूल ज़मीन पर गिरा फिर मुझे नींद आ गई

रईस फ़रोग़

किसी किसी की तरफ़ देखता तो मैं भी हूँ

रईस फ़रोग़

हाथ हमारे सब से ऊँचे हाथों ही से गिला भी है

रईस फ़रोग़

घर मुझे रात भर डराए गया

रईस फ़रोग़

फ़ज़ा उदास है सूरज भी कुछ निढाल सा है

रईस फ़रोग़

अपनी मिट्टी को सर-अफ़राज़ नहीं कर सकते

रईस फ़रोग़

तुम ऐ रईस! अब न अगर और मगर करो

रईस अमरोहवी

तिरा ख़याल कि ख़्वाबों में जिन से है ख़ुशबू

रईस अमरोहवी

राज़-ए-गिरफ़्तगी न असीर-ए-लहन से पूछ

रईस अमरोहवी

कल रात कई ख़्वाब-ए-परेशाँ नज़र आए

रईस अमरोहवी

कहीं से साज़-ए-शिकस्ता की फिर सदा आई

रईस अमरोहवी

ग़ुरूब-ए-मेहर का मातम है गुलिस्तानों में

रईस अमरोहवी

दीदनी है बहार का मंज़र

रईस अमरोहवी

निकलो हिसार-ए-ज़ात से तो कुछ सुझाई दे

रहमत क़रनी

जिस दर पे तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा न रहेगा

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

दिल है अपना न अब जिगर दर-पेश

रहमान जामी

आप से है मुक़ाबला दर-पेश

रहमान जामी

दिल की बर्बादी के आसार अभी बाक़ी हैं

राही शहाबी

लहू आँखों में रौशन है ये मंज़र देखना अब के

राही कुरैशी

लोग यक-रंगी-ए-वहशत से भी उकताए हैं

राही मासूम रज़ा

जिन से हम छूट गए अब वो जहाँ कैसे हैं

राही मासूम रज़ा

साक़ी भले फटकने न दे पास जाम के

राहील फ़ारूक़

कभी किसी से न हम ने कोई गिला रक्खा

इरफ़ान सत्तार

अब तिरे लम्स को याद करने का इक सिलसिला और दीवाना-पन रह गया

इरफ़ान सत्तार

आज बाम-ए-हर्फ़ पर इम्कान भर मैं भी तो हूँ

इरफ़ान सत्तार

कितनी दूर से चलते चलते ख़्वाब-नगर तक आई हूँ

इरम ज़ेहरा

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