दर Poetry (page 43)

लो फ़क़ीरों की दुआ हर तरह आबाद रहो

इंशा अल्लाह ख़ान

किनाया और ढब का इस मिरी मज्लिस में कम कीजे

इंशा अल्लाह ख़ान

काश अब्र करे चादर-ए-महताब की चोरी

इंशा अल्लाह ख़ान

है मुझ को रब्त बस-कि ग़ज़ालान-ए-रम के साथ

इंशा अल्लाह ख़ान

है जिस में क़ुफ़्ल-ए-ख़ाना-ए-ख़ुम्मार तोड़िए

इंशा अल्लाह ख़ान

आने अटक अटक के लगी साँस रात से

इंशा अल्लाह ख़ान

अन-देखी ज़मीं पर

इंजिला हमेश

सीप मुट्ठी में है आफ़ाक़ भी हो सकता है

इंजील सहीफ़ा

टूटा फूटा सही एहसास-ए-अना है मुझ में

इंद्र सरूप श्रीवास्तवा

आसमानों से न उतरेगा सहीफ़ा कोई

इंद्र मोहन मेहता कैफ़

शाख़-दर-शाख़ होती है ज़ख़्मी

इन्दिरा वर्मा

दोस्त जब ज़ी-वक़ार होता है

इन्दिरा वर्मा

जिस का डर था वही हुआ यारो

इंद्र सराज़ी

प्रोफ़ेसर ही जब आते हों हफ़्ता-वार कॉलेज में

इनाम-उल-हक़ जावेद

ख़ामोश खड़ा हूँ मैं दर-ए-ख़्वाब से बाहर

इनाम नदीम

ज़मीं बिछाई यहाँ आसमाँ बुलंद किया

इनाम नदीम

ये मंज़र बे-दर-ओ-दीवार होता

इनाम नदीम

जिस रोज़ तिरे हिज्र से फ़ुर्सत में रहूँगा

इनाम नदीम

आसूदा-ए-मता-ए-करम बोलते नहीं

इनाम हनफ़ी

ये क़िस्सा-ए-मुख़्तसर नहीं है

इम्तियाज़-उल-हक़ इम्तियाज़

हर बे-ख़ता है आज ख़ता-कार देखना

इम्तियाज़ साग़र

यूँही अक्सर मुझे समझा बुझा कर लौट जाती है

इम्तियाज़ अहमद

कोई तो है जो आहों में असर आने नहीं देता

इमरान-उल-हक़ चौहान

तेरे दिल से उतर चुका हूँ मैं

इमरान शनावर

लोग पाबंद-ए-सलासिल हैं मगर ख़ामोश हैं

इमरान शनावर

यूँ भटकने में की है बसर ज़िंदगी

इमरान शमशाद

तुझ को देखा तो ये लगा है मुझे

इमरान हुसैन आज़ाद

लोगों के सभी फ़लसफ़े झुटला तो गए हम

इमरान हुसैन आज़ाद

आसमाँ मिल न सका धरती पे आया न गया

इमरान हुसैन आज़ाद

मैं सच कहूँ पस-ए-दीवार झूट बोलते हैं

इमरान आमी

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